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यहां उनकी वह कविता देता हूं जो मुझे नागर जी से हासिल हुई थी. ये कविता उन कई कविताओं में से एक है जो उन्होंने नागरजी के लिये उनके बच्चों के प्रोग्राम में पढी थी और जो मुझे बेहद पसंद है.
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चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं.
इंसान संवरने में फुदके
अश्नान के करने में फुदके
पानी के भरने में फुदके
सीढ़ी से उतरने में फुदके
वादे से मुकरने में फुदके
चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं.
सोचूं तो ध्यान फुदकता है
आतमसम्मान फुदकता है
घर में मेहमान फुदकता है
खेतों में धान फुदकता है
खाऊं तो पान फुदकता है
चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं.
पेड़ों की डाल फुदकती है
घोड़े की नाल फुदकती है
कंधे पर शाल फुदकती है
चलने में चाल फुदकती है
चावल में दाल फुदकती है
चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं.
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