मैं मनु को एक लंबी पारी खेलने की शुभकामनाएं देता हूँ.
Wednesday, November 14, 2007
मनु राजीव का पहला अल्बम आलिया
मनु राजीव से मेरी पहली मुलाक़ात कालकाजी के एक साउंड स्टूडियो में हुई थी. तभी उसने अपना करियर बतौर साउंड इंजीनियर शुरू किया था. वह तब एक शर्मीला लडका था और साउंड की तकनीकी बारीकियों को समझने के लिये ज़रूरी किताबें कंसल्ट किया करता था. कान उसके हमेशा से ही सजग थे, ये बात मैंने तब जानी जब वो पंचशील स्थित यूटीवी के साउंड स्टूडियो आया. पहले जब मैं डिसकवरी चैनल के प्रोग्राम डब किया करता था तब से लेकर अब तक जबकि नेशनल ज्योग्राफिक, हिस्ट्री चैनल, बिंदास और हंगामा चैनल के प्रोग्राम्स की डबिंग में मैं माइक्रोफोन पर बैठा हूँ और मनु पैनल पर, हमारे बीच अपनापा बढता गया है. मनु को संगीत अपने परिवार से मिला है. वह दक्षिण भारतीय 22 वर्षीय युवक है और अब वह सिर्फ साउंड इंजीनियर या रिकॉर्डिस्ट नहीं, बल्कि ख़ुद अच्छा कम्पोज़र और गायक है. उसका नया अलबम आलिया बनकर तैयार है.
इसके वीडियो में हमारे साथी नीरज यादव अपनी अदाओं के साथ मौजूद हैं. कैसा है यह संगीत आप खुद ही यह बानगी सुनकर अंदाज़ा लगाइये.
मैं मनु को एक लंबी पारी खेलने की शुभकामनाएं देता हूँ.
मैं मनु को एक लंबी पारी खेलने की शुभकामनाएं देता हूँ.
Thursday, November 8, 2007
Wednesday, November 7, 2007
रेडियो रेड और क़िस्सागोई: सआदत हसन मंटो का अफ़साना बू

सआदत हसन मंटो किसी परिचय के मोहताज नहीं है.
उन्हीं के शब्दों में-
'ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाक़िफ़ हैं तो मेरे अफ़साने पढ़िये. अगर आप इन अफ़सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब ये है कि ये ज़माना नाक़ाबिले बर्दाश्त है. मुझमें जो बुराइयां हैं वो इस अहद की बुराइयां हैं.मेरी तहरीर में कोई नुक़्स नहीं है.जिस नुक़्स को मेरे नाम से मंसूब किया जाता है, दरअस्ल मौजूदा निज़ाम का नुक़्स है--मैं हंगामापसंद नहीं. मैं लोगों के ख़याल-ओ-जज़्बात में हेजान पैदा करना नहीं चाहता.मैं तहज़ीबो तमद्दुन की और सोसायटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े की पहनाने की कोशिश भी नहीं करता क्योंकि यह मेरा काम नहीं...लोग मुे सियाह क़लम कहते हैं, लेकिन मैं तख़्ता-ए-स्याह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक इस्तेमाल करता हूं कि तख्ता-ए-स्याह की सियाही और ज़्यादा नुमाया हो जाए. ये मेरा ख़ास अंदाज़, मेरा ख़ास तर्ज़ है जिसे फ़हशनिगारी, तरक़्क़ीपसंदी और ख़ुदा मालूम क्या-क्या कुछ कहा जाता है--लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कंबख़्त को गाली भी सलीक़े से नहीं दी जाती.'
लीजिये सुनिये मंटो की लिखी ये कहानी--बू.
शुरू में आवाज़ें अरशद इक़बाल और इरफ़ान की हैं. क़िस्सागो हैं मुनीश.
Dur. 15 min approx.
Friday, November 2, 2007
रेडियो रेड और क़िस्सागोई: उदय प्रकाश की कहानी दरियाई घोड़ा
हमारे यहां क़िस्सागोई की पुरानी परंपरा है. पिछले कई बरसों से योरप और अमेरिका के क़िस्सागो दिल्ली आ रहे हैं और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, इंडिया हैबिटैट सेंटर और ब्रिटिश लायब्रेरी जैसे सुरुचिपूर्ण अड्डों पर कथावाचन करके हमारे मुंह आईनों की तरफ़ घुमा रहे हैं. दो-एक दिन इन हलचलों का असर अख़बारों के पेज थ्री पर रहता है और तस्वीरें छपती हैं फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है. वो लोग तो यहां तक कह कर चले जाते हैं कि आपके यहां कथावाचन मर रहा है, यह सुनकर हमारे लोग कभी नॊस्टैल्जिया तो कभी सेंस ऒफ़ प्राइड से भर जाते हैं. जिस एक चीज़ की कमी रह जाती है, वो है शर्म. इसी शर्म से उन्हें बचाने के लिये मेरी संस्था रेडियो रेड वाचिक परंपरा को बचाने और पुनर्जीवित करने में लगी है. पिछले दस वर्षों से जारी हमारी कोशिशों में हिंदी की संस्थाओं और संस्कृति संरक्षण के पैरोकारों ने झूठी तसल्ली भी नहीं जोड़ी है. इस वाचिक परंपरा की याद जब विदेश में सक्रिय storytellers करते हैं तो ये संस्थाएं या संबंधित लोग तसल्ली से भर जाते हैं कि देखो जो आज पश्चिमी देशों में हो रहा है उसे हम पांच हज़ार साल पहले कर चुके हैं. और हमें इस तसल्ली में सुनाई देता है कि विमान का आविष्कार भले ही हाल के बरसों में हुआ हो हम तो पांच हज़ार साल पहले से पुष्पक विमान उड़ाते आ रहे हैं. हमारे मंत्रों से बारिश और आग संभव है.
बहरहाल, हमें तो इस तसल्ली से कुछ ज़्यादा चाहिये. सैकड़ों मह्त्वपूर्ण किताबें आज not to issue का बिल्ला लगाए पुस्तकालयों में पड़ी हैं या फिर दीमकों का शिकार हो रही हैं, तमाम दिलचस्प कहानियां, कविताएं, नज़्में, ग़ज़लें, डायरियां, संस्मरण, व्यंग्य, यात्रा-वृत्तांत, रेखाचित्र, रहस्य रोमांच की कहानियां और प्रेरणाप्रद प्रसंग- आत्मकथाएं...आदि सुनाए जाने की राह देख रही हैं. विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकालयों ने हमारी तमाम भारतीय भाषाओं की किताबों की माइक्रोफ़िल्मिंग करा ली है और उनके डिजिटल संस्करण करके सुरक्षित कर लिया है. वो दिन दूर नहीं है कि यह सब कुछ वे हमें शॊपिंग मॊल्स में थोड़े वैल्यू एडीशन के साथ बेचने लगेंगे. छपी हुई किताब को सुनी जा सकने वाली किताब बना देना भी वैल्यू एडीशन का एक रूप होता है, ये तो आप जानते ही हैं.
तो भाइयो, एक जुनून है जिसमें हम क़िस्सागोई, कथावाचन, वाचन या Storytelling कर रहे हैं चार लोगों की एक छोटी सी टीम में आज डेढ़ दर्जन वाचक ,Narrators, Voice Over Artistes हैं और जो परंपरा संरक्षकों का तमग़ा हासिल करने की इच्छा से ऊपर ही रखते हैं अपनी मौज और इस काम से मिलने वाले सुख को.
इस मुहिम में आप हमारे आदि सहयोगी हैं और नहीं लगता कि जल्दी हमारे हौसले पस्त पड़ेंगे.
तो पेश है वाचिक परंपरा को पुनर्जीवित करने के प्रयासों से एक बानगी.
उदय प्रकाश उन कथाकारों में से हैं जिनकी कहानियां अपने कथ्य और बनावट के अलावा तर्ज़े बयां के लिये भी याद की जाती हैं. उनकी अनेक कहानियां सुनाते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि रवानी में कोई रुकावट आ रही है, आपको भी लगा होगा . दूसरे की भाषा आपकी ज़बान पर जब चढ़ती है तो मीर याद आते हैं.
इस पेशकश के शुरू में अरशद इक़बाल और अपर्णा घोषाल की आवाज़ें हैं.
Duration: 46min 46sec
क़िस्सागो: मुनीश
फ़्लैग्स
Radio Red,
storytellers,
उदय प्रकाश,
कथावाचन,
क़िस्सागोई,
दरि्याई घोड़ा,
मुनीश
Thursday, November 1, 2007
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