दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Sunday, April 19, 2009

क्या कुछ ब्लॉगरों का यह यात्रा अभियान मेल शोवनिस्ट है?


मुनीश से मेरी दोस्ती अब उतनी ही पुरानी हो चुकी है जितनी राम पदारथ से मेरी दुश्मनी. इस शुरुआती लाइन के बाद मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ जिसका सम्बन्ध इन दिनों ज़ोर-ओ-शोर से चल रहे एक यात्रा अभियान से है और जिसका सूत्रपात भाई मुनीश ने किया है. अगर यह अभियान सम्भव हो पाता है, जिसकी संभावना अब बलवती होती दीख रही है, तो ब्लोगरों का एक बड़ा समुदाय यह कह कर इसे लांछित करेगा (और एक हद तक मैं भी उस समुदाय में शामिल पाया जा सकता हूँ ) कि इस योजना को मोटर सायकिल पर प्रस्तावित किया गया है जो kइ भारत जैसे देश में अब भी महिलाओं का प्राथमिक वाहन नहीं है. इस प्रकार चाहे अनचाहे महिला ब्लोग्गेर्स को इस muhim से बाहर रखने की उनकी इच्छा पर उंगली उठाई जानी चाहिए. काफिले में चार पहियों की गाडी अभी ठोस रूप से शामिल नहीं की गई है. क्या इसमे मुनीश की उस dhankee भावना का हाथ है, जिसमे सुनते हैं की वो औरतों को घरेलू काम के लिए ज़्यादा सक्षम पाते हैं?
मित्रो इस ऐतिहासिक यात्रा को बेदाgh बनाने के लिए ज़रूरी है कि इसके ऊपर संभावित lanchhanon को जल्द अज जल्द दूर करने का प्रयास किया जाए.

Photo curtesy http://www.motorcycle-friendly.com

Hindi Writing Tool ke abhaav me likha gaya.

11 comments:

Raviratlami said...

इसमें मोटरसायकल के साथ साथ एक-दो सफारी जीप भी जोड़ लिया जाए तो क्या बुरा है? अलबत्ता मैं यहाँ भोपाल में स्वागत करने वालों में रहूंगा :)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कुछ भी भला करने से पहले लांछनों की चिन्ता तो कभी होनी ही नहीं चाहिए।

मुनीश ( munish ) said...

"हर सीज़र को ब्रूटस वहीं मिलेगा उसके आस-पास '' ये लफ्ज़ तुम्हारे ही हैं ना इरफान ? अब तुम्हारी इस अदा पर क्या कहूं ..''Et Tu Irfaan ?" इमारत अभी बनी नहीं उसकी ऊपरी अवैध मंज़िल गिराने वालों का कारपोरेशन दस्ता पहले आ गया ! मैं चाहूं तो तुम्हारे हर इल्ज़ाम का जवाब मैं यहीं दे सकता हूँ भाई लेकिन नहीं ऐसा कह के मैं तुम्हें बेज़ा अहमियत नहीं दूँगा...और मचाओ ये गपड़चौथ । अरे कभी positive भी सोचो ,समझे ?

रचना said...

there are many things which may not interest woman who blog , and vice versa there may be somethings which may not interest man who blog

such trips fall in personal interst
category and have nothing to do with bloging so why even bother with them , except that the trip is by chance being organised by some bloggers

munish all the best for your trip and looks like irfan wanted to be sure that latter on when you guys return after successful completion there should be no blemish to mar the joy

enjoy and if in ghaziabd do let me know the dates

regds

Anil Pusadkar said...

हम तो इस अभियान को अपनी शुभकामनाये दे चुके,दे रहे हैं और देते रहेंगे।हां और हो सका तो उससे प्रेरणा लेकर यंहा छत्तीसगढ मे भी इस तरह का यात्रा अभियान आयोजित करने की कोशिश करेंगे,संभतयाः ठ्ण्ड मे।

Anil said...

महिला ब्लागर को मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बिठा लीजिये - problem solved! :)

PD said...

:)
vah.. Bike trip.. :D

Ashok Pande said...

इरफ़ान रस्ते से भटक गया दिक्खे. अच्छा भला मुनीस बाबू बिलागरमण्डल को एक नया रस्ता दिखलाने का परजास कर रये थे कि गन्दे गाने सुनाने वाले हमारे भूतपूर्व-अजीज इरफ़ान उर्फ़ इफ़्फ़न घुरमामारकण्डवी ने 'मिशन सप्त-सरोवर' की ऐसी तैसी फ़ेरते हुए उस पर मेल चाऊनिज़ाम का इश्टीकर चिपका दिया.

देखिए मेलों के चाऊनिज़ाम से हमें कोई मल्लब ना था. ना हैगा. ना रएगा.

इफ़्फ़न की इन लातों से घुटनों घुटनों चोटिल मूनीस बाबू ने फ़ून पर मुझे जब इस कारजस्थानी की तफ़सीलातें बयान कीं तो कलैजा ऐसाबैसा हो गया लगने को होईय्याया!

अब जा के मैंने और मूनीस भाई ने तय किया है कि हम लोग चाऊनिज़ाम मेल का इश्टीकर लगाने को भौत बड़ी बेज्जती समझ के फ़ाइनली अपना डेस्टीनेशन बदल रये हैं.

मुनीश ( munish ) said...

I strongly doubt some feminist lobby doesn't want to see us together.Otherwise he could not be so senti about getting this trip spoiled .I think we need to have a word ..In the mean while lets think of a new place to visit alongwith Irfan, afterall he is an old friend.

swapandarshi said...

I think the objection will be valid only if the women bloggers want to participate in this trip and motorcycle is only hurdle for them.


I believe, this may not be the primary hurdle. Can be secondary and alternatives can be found if someone wants to Join.


I feel the primary hurdle may relate to the security, trust and if women feel comfortable around the guys they do not know, except blogging. And the social structure, which is less flexible in accepting male-female friendship beyond their sexual identities.

Organizing trip this way or that way does not make much difference. You guys go ahead and enjoy. Ending gender discrimination and reclaiming a common humanity is a long journey.

मुनीश ( munish ) said...

who is she Irfan ? come on now announce her name here who tried to sabotage this trip by influencing u with her antics!