दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Tuesday, May 6, 2008

नसुडी : परमाणू बम

नसुडी एक और परफ़ॉर्मेंस का ट्रान्सक्रिप्शन-

भइया! हम गवइयन के आदत हौ कि पीछे ना कहब,समाज बदे चाहे जौन कुछ बोल जाईं. बोलब त समाज के प्रती बोलब, बिचार के प्रती बोलब.
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पंचौं ठीक हौ, हम बहुत बडा गलती करीला लेकिन एतना सज्जन भइअयन में केहू अपने मेहरारू के मेहर कहेला? लडिका से आके पूछेला कि क रे बच्ची मेहर कहाँ गइल हमार? आई त पूछी ए बच्ची!माई कहाँ गइल तोहार. ई न कहत कि मेहर कहाँ गइल हमार. सोच लीजिये कि ऐसा ही गायक हमें सोच के लोग ली आते हैं, जिसको तमीज नहीं है बोलने का.

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राखी जउन बंधात होई त सुबह में बँधात होई, पूर्णिमा के बँधाई. बारह बजे रात राखी बान्हे के ऊ लिखले हौ चिट्ठी में? केसव लिखत हउवन,गाना मुस्तफा गावत हउवन? ई कबिताई करत हउवन? होस में बेहोसी के बात बात करत हउवा? हम त धीरे से छुवाई ला न हो!! आजकल के गवइयन के होला कीरी, ऊ काटे लगिहै अइसे-अइसे. तब हम्मै लगेलेन खरबोटे!

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जे तमीज का बात करेलेन...जज के मकान में पुलिस का पहरा रहेला? एक खे दरबान रहेला. वहाँ मिलिट्री का कैम्प रहेला जज के ईहाँ? मजाक मत करा! बिरहा हौ, लोकगीत हौ, ओके पढ ला कहाँ तक गलत हौ, कहाँ तक सही हौ.

जज के हाथे में फैसला ना हौ, फैसला कानून हौ. साबूत जब तक नहीं देंगेतब तक अज्ज-जज्ज, कलट्टर, एसपी कुछ करता नहीं है. इंद्रा के मरले हउवैं खालसावाले सब पंजाबी. लेकिन कानून हौ. ई देस जानत हौ कि इंद्रा के इहै गोली-मसीनगन से मारा लेकिन वो कानून के और सबूत के पीछे आजतक जीवित है. तो...कानून होता है. मजाक कर दिये हो कानून से!

आप एहर से धरम डकैती सुनें कि धरम के डकैती कहाँ हौ--


धारा नगरी है मसहूर
जहाँ पर रही हुस्न की हूर
सहूर में रही नाजनी मंडी था जिसका नाम

भइया! धारा नगरी में एक लडकी रहल. ऊ बडी गरीब घर की लडकी रहल लेकिन वो खूबसूरत थी. उसके पीछे लोग पडे थे. लेकिन वो समाज हेरती थी कि "हमार सादी लब से करब जे सामाजिक होई उससे." कि समाज का होला? ई समाज के अथ्र में मुझको लाना है. तो कैसे आएगा? तुमको ठोकर लगेगा तभी आएगा. देखें भइया, होता क्या है- कहलन कि

ए मुसाफिर भटकता है क्यों दर
दोनो आलम का रहबर मदीने में है

त तूहौं मदीने में जा. इहाँ कटहर लेवे अइला ह? तुहऊँ जा मदीने में. जब दूनों चल गइल हँ त तू इहाँ रह के का करबा? ओ ठीयन तोके खाए के मिली, एठीयन का करत है मरदे! जा ओहरियें. तो बाऊजी होता क्या है-


तुम भटकते रहे हो, भटकते रहो
मानो की सक्ती मानो के सीने में है

हमार सक्ती हमरे सीने में है.

न काबा में है न कासी में है
मानो की सक्ती देखो हसीनो में है

त भइया, कौन नहीं मोहा? कौन बडा है हसीनो से? कोई है पीछे? तोहार मेहरारू बुड्ढी हो गइल हो त अगले-बगले देखत होबा कि केकर सौखीन बाय?

माया की सक्ती मानो हसीनो में है

हमने ई कहा कि माया ओहीके कहेलेन कि एक माया माई के छोड के तब से दूसर माया- ई जौन माई कहली ह, कि लडिकईं में माई सब सरीर देखेला औ सयनई में मेहरारू कुल सरीर देखलीन; एकरे बाद कोई देखता नहीं है.

और माया हौ, माई जियत हौ, मेहर आ गइल त ओ माया के छोडके ई माया घेर्रा के लेके चल जाला. तो बात मिलती है. बात एही है, कैसे?-

देख मंडी का सूरत सभी जन सटे
एक पलक सी नजरिया मिलाती नहीं
डाल था गरीब का एकलौता सुनारा
मंडी से जिसका लड गया नैनों का नजारा
एक रोज बोला डाल, मेरी जान बता दो
कैसे तू हो गई फिदा-ए-मुझसे सुना दो
हँसकर के बोली मंडी अमीर तुम न होते
आकर के हर गरीब पर अपनी निगाहें खोते

डाल पूछ रहे हैं मंडी से कि तोहार खर्चा हमसे न चली औ तोहसे हम बियाह न करब. कोई बड घर के लडकन से जाके अपनी सादी करले, काहे कि एतना बढियाँ सुंदर रूप हौ. तोर खर्चा हमसे न चली. मंडी कहलस- सुना हो!तोहसे बियाह हम करब औ कोरट लब से.अमीरन के निगाहे में मोहब्बत ना रहै. हमरौ से सूरत जे के पा जइहैं त हम्मैं ठोकरा दिहैं, ओकरे प निगाह डाल दिहैं. ऐसा बिचार होता है उन लोगों का. त ऊ बिचार से हम्मर सादी न होई. मंडी कहे लगल कि हम तोहरे संग सादी करब. त डाल कहल कि हम मट्टी भरब त तोहैं मिट्टी ढोवै के होई. हम गरीबन के कहाँ पइसा पाई. कुली-काजर के का मिली. ऊ कहा- तू मट्टी भरके उठावा हम सडक पर मट्टी डालब. हमार सब के नौकरी से काम होई लेकिन सादी करब त गरीबे से.
त बाऊजी होत का हौ? एक्खे तरज एम्मे मिलल हौ-

बोहाई परै मेला में सइयाँ न हेराए हो
सार न भेटाए हो बेकार भएल मेलवा में

का कटले हौ? उनके ससुराल वाले आदमी बतावैं कि हम्मै इहे कटलेस ह. कीरा कटलेस हौ कि बिच्छी कटलेस? कि हम कुछ छुवा देहली ह? अइला ह बहनोईवाला करे? जेके छुवा देली, भागल ढोल करताल लेके- ऊ गवइया हम हई. हमार संगे ई पाल्सीबाजी तोहें सभैके ना करेके चाही. आज त हम्मार इज्जत होए के चाही ओनकर त रोज होत ह!

बाऊजी! मेरे सज्जन भइया! अब बात मिलल आगे क...

अरे चेहरे पर थी उदासी हर घडी
भाग के चले हैं दूनो आए हैं जब कासी
चेहरे पर थी उदासी हर घडी

भिया हम गवइयन के आदत हौ कि पीछे ना कहब,समाज बदे चाहे जौन कुछ बोल जाईं. बोलब त समाज के प्रती बोलब, बिचार के प्रती बोलब.

बाऊजी! एक रात के जब रात भेयल तब मंडी किहन पहुँच गयेन बडे लोग रिवाल्वर लटका के. कहत हउवन आज डाल के मार के मंडी के जबरीं उठा लेत हईं. का करिहन साला गरीब-सरीब त हएन. ओन्हे के कहाँ ताकत बा? ओके मारके उलट दे, ओके रख ले.


मंडी कान से सुनत हौ. जब साम के डाल खाए आवत हौ त मुहैं मे जब कौर नावत हौ त कहत ह- सुना हो! आज तू अपने पेट भर, आत्मा भर खा ला. कहेन- बात का हौ बात दे, त कहैं - का तोहैं बताई- फलाने-फलाने चच्चा आयल रहलें,तौन तोहें मारै के कहत रहेन. औ कहलन कि मार के मडई में सुता दा औ एके मंडी के निकाल के मडई जला दा. त आज हमसे तोसे मुलाकात छूट जाए वाला हौ. डाल के मुहैं में से कौर थाली में गिर गएल.


ई गरीबी हौ
औ ई धरम के डकैती हौ

जे कहेला ईहै धरम हौ, ऊहै धरम के डकैती करत हौ?

बाऊजी! डाल कहल कि हम तोसे पहिले कहिली कि हमसे बियाह मत करा, मगर तू मनलू ना, हमरे जीवन के तू खतरा हो गइलिन.

मंडी कहत हौ- तब कत्तौं भाग के चल चला, जौन देस ईमानदार है. कि हमर सब क ओट्ठिन जिंदगी बच जाव और भाग के दूनो आ गइलन कासी में.

इहै कासी हौ और धारा नगरी से दूनो भाग के अइलैं लेकिन इहाँ कबी के भाव ऐसे हैं-

कौन तर्ज बा हो?


आके कासी में बोले हैं दूनो सभी
जिंदगानी हमारा सुधर जाएगा


बाऊजी! सुननेवाले मेरे सज्जन भइया! देखिये धरम की डकैती कैसे होत हौ?

बाऊजी आखरी बजार मसान पर लगेला जहाँ पर मुद्दा खतम हो जाता है. जई दियाँ से दफनाला ओही ठिना से आखरी होला. कबी कहलेन-

और केतना जनी कहलें-

"लगली बजरिया अगमपुर हो, हीरा रत्ने बिकाय"
ओनसे हम पूछीला अगमपुर कहाँ हौ? ई बीचमे गयल रहला ह कतौं? देखले ह अगमपुर? सोना में रतन खरीदे जाता चोरऊ? चोरीकट बात सिखावत हउआ? असली बाजार जहाँ लगेला उहाँ बताय दा.

मंडी का करत हौ? उसी भाव में भइया!


शौक से दोनो रहने लगे
छाती में भरकर हुलास
सुख से जीवन बीत रहा है

आगे का सुनिये इतिहास
अरे संग चले हैं दोनो एक दिन


बाऊजी! कत्तकी पुर्नमासी का पर्ब लग गया. औ उनहने दूनो झउआ फेंकत रहलेन. कउनो काम केहू बताय दे- नौकरी करत रहलेन.

कत्तकी पुर्नमासी क जब नहान लगल त ऊ कहत हौ डाल! आज कउनो परब ह? सभै नहाए जात ह, आज अगर काम न करतीं त हमनी नहाए चलल जात. बडा धरमी पुन्न होला.

मंडी कहै तू नहाय ला, औ डाल कहे तू नहाय ली. दूनो आपस में बात करत हउवन. त मंडी कहत ह-तू नहाय के आके बइठा, जब हम नहा के आइब त तोहार चरन क पूजा करब, हमार तारन-तार हो जाई. एट्ठीन त तू हमार भगवान हउवा.हम दोसरे के केके मानी? डाल नहाए जात ह...तबसे भयल का!


बाऊजी!
मेरी पुतरी रे मेरी पुतरी

अच्छा तोहईं लोग सोचा- हमाए घर कुरउना पडेला, भदोही रोड पडी कमसकम इहाँ से सात कोस. अ तवन भइया कहलन कि बिसेसरगंज में एन बोरा ढोवेलेन. ठीक हौ हम बोरा ढोईला लेकिन डकैती ना न करीत, त का बेजाँय करीला? खट के खा लेवे के न चाही? हम बोरा ढोईला त का बेजाँय करीला? तोहरी बहिन-बिटिया के बुरा निगाह से देखीला, बोरा ढोईला त? का बेजाँय कइली? बोरा ढोईला, तोहैं बोरा ढोए से चिढ हौ? तोहैं कौनो गुस्सा लगत हौ तो कहा अरे यार बोरा मत ढो हमरे इहन बैठ के खो. तोहें तकलीफ होए त ले चलके खियइबा-पियइबा कि बोरा ढोए क मेहना मारत हउआ हम्मै?

बाऊजी! देखल जाय! उहाँ दोनों जब नहात हवैं त भयल का?

अइसन सुंदरी हो अइसन सुंदरी
कइलन उहाँ सब जबरी

बाऊजी! डाल नहात हौ. तब से पंडा लोग पहुँच गइलन लडकी के पास. पंडा लोग पहुँच के कहत हवैं- का बचवा! इहाँ का करत हऊ बइठल?
कहला बाऊजी! हमार पती नहाए गएल हउवन, नहाय के अइहन. त कहलन-"ऊ छतरिया में काहे न चलतू? एट्ठीन बइठ के का करत हऊ? ओ छतरी में चला.ओई ठीयन आपन संकल्प छोडा ले."

कहे ओन्है नहाय के आ जाए दा, हमहू नहाए लेईला तब संघै चलीला, चलके संकल्प छोडाए लेहीला आए के-छतरी में.

तब से एक पंडा अऊर आ गलेन, दुई पंडा,तीन पंडा,चार पंडा...धीरे-धीरे हो गइलन छ: पंडा.चारी ओरी से ओके घेर लेहलेन.

अउर घेर के अब ओके जबरी करत हउवन.

केहू जने ओकर पखुरा धइलन, केहू ओके हाथ धइलन, केहू जने चचुरियावत हउवें, केहू जने ओकर सर समान उठावत हउवें.

ऊ कहलाँ नहाए गयल हउवैं अइसन मत करत जा. तब अउर मेला पूछत हौ कि क हो भइया! ई लडिकिया के तू लोग काहे पेर्रावत हउवा?

कहैं कि एकर माई दू थप्पड मार देलस हौ, ई कोहाँ के गंगाजी में कूदे बदे जात हई, ओही से एके धई के हमने ले जात हई-


अरे केहू धइले चेचुरा, केहू लेहलेस लतरी

कइलें जबरी हो कइलें जबरी

अरे इहे छतरी हो उहै छतरी , तबलें पहुचाय दिहलें कोठरी हो


अच्छा बाऊजी! देखा जाए- ए छतरी से ओ छतरी पहुँचा देहलें. छतरी देखात-देखात ओके कोठरी में सब बंद कर देलन.


एहर जब डाल निकल के पंडा से कहत हौ- गुरूजी(गोड पकड रहा है)... अऊर बिटिया बना के लडकिया के ले गयल हउवन...बाप हवैं. ई धरम कहेला! बिटिया बनाय के, ओ के ले जाय के बंद कै दिहिलन...औ डाल पूछत हौ-"एक्खे लडकी रहल है, मेहरारू अइसन! कवने ओरी गइल गुरू!

कहैं-"हम तुम्हारा मेहरारू अगोर रहे हैं? यहाँ मेहरारू अगोरवाने आए हो?"

पंडा लोग कहत हउवन-"मेहरारू अगोरवाने आए हो?"

कहैं-"नहीं गुरूजी! हम पूछत हईं,हम अगोरवावब ना!"

कहैं-"भाग एहरै गोदौलिया ओरी."
ऊ बेचारा भीजल कपडा पहिर के गोदौलिया के ओरी आप मेहरारू हेरै जात है.
औ तब से ऊ कहाँ पाई? पंडा लोग त दरियैं चोरा लेले हवैं. धरम की चोरी हो गई वहाँ. औ रात होत हौ तो पंडा लोग अंडा-सराब खा के पहुँच गइलें ओकरे पास.

लडकी हाथ जोड के कहत हौ- बिटिया बनवले हवा, बिटिया रहे दा. जिंदगी भर तोहार कपडा कचारब, खाना बनाइब. तोहार बिटिया हई, हमार धरम बिगड गइल ह, अब हमार धरम बिगाडा मत.

लेकिन जब छनल ह...

बाऊजी! नहीं माने लोग और उसके साथ छः-छः रोज का ओसरी पंडा लोग लगा लिये. छः रोज एक पंडा रखै त छः रोज एक पंडा रखै.

लडकी मरने काबिल हो गई, रात दिन रोती थी और उसका प्राणी जो है पागल होकर भीख माँगता है.

ई तेरा धरम कहता है? यही धरम है? इसी को हम लेकर गंगाजी अपने मेहरारू के, बहिनी के लेके चली नहवावै? औ धरम करै? और ऊहाँ के धरमी लोग जे बइठल हैं, ऊ चोरा लें? यही धरम है? तो धरम की डकैती वहाँ हुई.


रोवे मंडी बेचारी मैं क्या करूँ

फूटल मोकद्दर हमारी मैं क्या करूँ.


तब ऊ करे का लगल, कि जब सोचलस हमार जिंदगी ना बची तब एक्खे धोती रोज फारे और जवन खाये बनाये के दें ओके सान के गइया-गोरू के खियाय दे. औ नंघै रहे. जब पंडिज्जी पहुँचैं कहैं "का रे!कपडवा का भयेल?"

"तोहार माई आए रहीन ओनही ले गईन."

लगल गारी फक्कड देवे,उबियाई लेहलस. ओनकर ओसरी होए त जब उबियाई गयलन त कहैं, अरे यार तोहहीं रख लेता त नगद रहा. त छवो लोगन के हिम्मत ना परल. उपद्रव करत धन के बरबादी करे लागल. कहे, ई हमरे पीछे परल हवन त एनके पीछे हमहूँ पडब.

बाऊजी! रोती-रोती जब हैरान हो गईल. तब नंघे रहे लगल तब ओम्मेसे जब सतवाँ पंडा कहे-हम्मे दे दे यार तोहने मत रखा.

तब ओनके ले लेलन. त ओन एक रंडी से कहत हन कि हमरे एक खे लडकी हौ लंबी? त रंडीवा कहत हौ कि हाँ सरकार लेब लेकिन बेना देखे ना लेब.

जब आके ऊ बरतन माँजत हौ ऊ लडकिया, त कहत हवन देखा ऊ हमार बिटिया है अगर जितना दाम देवे के हो तो दा.

तब रंडीवा कहलस कि पंद्रह सौ रुपिया ह.
कहल ले जा पंद्रह सौ रुपिया दा.

एक हजार पाँच सौ में बेच दिये उसको
रोए मंडी बेचारी मैं क्या करूँ

बाऊजी! आ गईल रंडी के कोठे पर. जे ओकरे पास त अइसन गाना गाव कि केहू हमसे हालचाल पूछी कि रंडी तैं काहे भइली त हम ओसे कुल कारन बताइब. त ऊ गावत का ह?


जमाना रे प्यार पा गया
प्यार पा गया सिंगार पा गया


बाऊजी! कोई पूछनेवाला न मिलत हौ कि जमाना रे प्यार पा गया, जमाना रे सिंगार पा गया. लेकिन कोई पूछ्ने वाला नहीं मिल रहा है.

एक रोज एक बाऊसाहब जात रहलैं रंडी के पास. औ जवन ई पगला रहेस, भीख माँगत रहै-बाऊसाहब क धइलस गोड.
कहलस आके दुकाने प खिया द हम्मै कुछो सरकार.

कहलन भाग साला. छू दिया हमारा गोड.

झटक देहलन. पीछे ओरी गिर पडलल,ओकर खोपडा जौन हौ...

Tuesday, June 12, 2007

नसुडी को चाहिये नई भवानी

कोई छै साल पहले नसुडी यादव की जब मौत हुई तब भी और आज तक मैं उनके प्रति श्रद्धांजलि के दो शब्द न पढ सका न लिख सका. बिरहा प्रेमियों ने आहत मन से इस सच्चाई को स्वीकार किया होगा. बिरहा गायकी की एक बिल्कुल अनूठी शख्सियत की अनुपस्थिति हमेशा महसूस की जायेगी. वो मिर्ज़ापुर की ग़ल्लामंडी पल्लेदारी करते थे और साथी गायकों की अवहेलना और दुष्प्रचार के जवाब में इस तथ्य को पेश करते हुए दूने आत्मसम्मान का अनुभव करते थे.
हालांकि खुद नसुडी जहां भी होंगे, मेरी उपरोक्त पंक्तियां पढ्कर ज़रूर ही चिढ जाएंगे और बेसाख़्ता बोल उठेंगे "सरऊ जीतेजी तोहके नहीं बुझाइल, अब मरले बाद सोहरावत हउवा?"
नसुडी अपनी विशिष्ट शैली और बेबाकी के लिये जितने लोकप्रिय हुए उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. कहते हैं कि नसुडी के आयोजनों में भारी पुलिस बंदोबस्त और प्रशासनिक मुस्तैदी से काम लिया जाता था. हाल के बरसों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के इलाक़ों में बदलते जातीय समीकरण और दलितों-पिछडों में बढती राज्नीतिक-सामाजिक जागरूकता और नसुडी की लोकप्रियता में संबंध तलाशा जाना चाहिये. हर सामाजिक आंदोलन के गायक होते हैं, शायद नसुडी भी ऐसी ही उथल-पुथल भरी सामाजिक-राजनैतिक परिस्थिति में एक परिघटना की तरह उभरे. ब्राह्मणवाद-विरोध और वर्चस्वशाली जातियों-वर्गों पर तीखे हमले नसुडी के सांस्कृतिक अजेंडा का अभिन्न हिस्सा हैं.
यहां पेश है नसुडी के एक नाइट लॉंग परफ़ोर्मेंस का आंशिक ट्रांस्क्रिप्शन----



मंदिर बनावेवाला आप, महजिद बनावेवाला आप. मुर्ती बनावेवाला आप. चंदा लगा के मुर्ती लेआवेवाला आप. ओम्मे बइठवला तोहहीं. अउर तोहहीं ऊ मुर्ती के नाम रखला कि फलना बाबा. औ पूजा करबा, चढइबो करबा, परसादियो रखबा, फिर चढा-ओढा के अपना खाऊ जाबा. त के तोसे महान बा? सारी सक्ती तोहरे में बा. औ जाए लगबा त दरवाजा बंद कर देबा, कहबा अब तू एही में रहा. अब हम जात हई घरे.

(सह गायक पूछता है): अउर एकाध दिन भुला जाएं, न बंद करें तब ?

नसुडी: तब कुक्कुर मूती बे ! कवन उपाय बा ? दरवाजा खुलल रही त कुक्कुर मूती. त सोचा! जब ऊ कुकुरे से मुतवावत ह मुहें में त तोहार मदद करी ? ओके कहेके चाही--मत मूता रे एही में हम हई. जब ऊ आपन मुंह नाही बचावत हौ, त तोहार मदद करी ऊ ? हम कहीला बइठावे के बइठाय द हर घरे में लेकिन मुर्ति क बात बतावत हई कि मदद करी त मानव करी. ई कहना बा--

तोहसे हौ ना महान कोई अरे दुनिया में
बेहडा पार लागी मानव के सरनियां में

त भइया, संसार में सबसे बडा नाम होला. जेतना बडा नाम भगवान का ओतना बडा नाम घुरहू का. दुन्नो नाम बराबर होला. भगवान कतल करिहें त भगवान के फांसी होई अउर घुरहू कतल करिहें त घुरहू के फांसी होई. वल्दियत से काम चलेवाला नाहीं हौ, कि तू कहला हम राम क लडिका हईं त छमा कई द? ई छमा-वमा वाला बात न रही. जे गलती करी तेकर फांसी होई. 302 के मुल्जिम होई.

आया है सो गया नहीं
राजा रंक फकीर
ना कोई को बिवाय मिले
ना कोई को लगे जंजीर!

त भइया ! आप लोग के आसिर्वाद के हमको भरोसा बा. आप लोग आसिर्वाद दे देइहैं त ई काया अगर रोड पर मर जाई तब्बौ एक गज कफन मिल जाई. अउर कवनो मंदिली में जाके मर जाईं त हम्मे कफन न मिली. औ भगवान-भगवान करी तब्बौ न मिली. तहार सब के संगत रही त हम्मे कुल चीज मिल जाई. एह से हमार मानव से जादा प्रेम रहेला. औ हम्मे भगवान-ओगवान के फेर नाहीं रहत कि हम्में भगवान मिल जइहें त खियइहें. तू मिलबा त खिया देबा, ऊ पट्ठा न खियाई. ऊ त दांत चियरले हौ मंदिर में. ऊ त खुदै हमार खात हौ, ऊ का खियाई ? जे चहिबा ओके तू खियइबा, महानता तोहरे में हौ के ओकरे में?