दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Tuesday, December 11, 2007

उमा देवी: काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...


सुबह जब यूं ही नेट पर भटक रहा था तो नज़र पडी- काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...
कहा जाता है कि फ़िल्मी गाने आधुनिक जीवन के लोक गीत ‍हैं. इस कथन को पुष्ट करती यह पोस्ट देखें. १९४८ में महबूब की फ़िल्म अनोखी अदा ने कामयाबी के झंडे गाडे. सुरेन्द्र, नसीम बानो, प्रेम अदीब, कुक्कू, अडवाणी और नवाब इसमें प्रमुख भूमिकाओं मे थे. यह एक प्रेम कहानी थी. नौशाद के संगीत से सजी इस फ़िल्म के गाने बहुत मक़बूल हुए. इतने कि आज किन्हीं ब्लॊगर फ़ुरसतिया के मुताबिक़ लोकगीत बन गये. इसी पोस्ट में उन्होंने काहे जिया डोले के बोल थोडी अशुद्धियों के साथ जारी भी किये हैं और रचनाकार अज्ञात बताया है.
आप जानते हैं कि शकील बदायूनी कोई अज्ञात शायर नहीं हैं लेकिन कई बार स्मृतियों में कोई चीज़ ऐसी जगह बना लेती है जिसे तथ्य के बजाय मिथक मानना अच्छा लगता है.
अनोखी अदा में कुल बारह गाने थे जिनमें से कुछ अंजुम पीलीभीती ने लिखे थे. सुरेंद्र, मुकेश और शमशाद बेगम के अलावा इस फ़िल्म में उस ज़माने की उभरती हुई गायिका उमा देवी ने गाने गाये थे. यह काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय... गाना भी उमा देवी का गाया है जिन्होंने १९४७ की फ़िल्म वामक़-अज़रा से अपनी फ़िल्मी पारी शुरू की थी और बाद में आप उन्हें टुनटुन की शक्ल में हास्य भूमिकाएं करते हुए देखते हैं. यहां आप सुनेंगे उमा देवी का गाया वामक़ अज़रा का वह गीत, जिससे उन्होंने शुरुआत की. आप वह गाना भी सुनिये जिससे मुझे यह पोस्ट लिखने की ज़रूरत जान पडी.
एक और गीत जिसका ज़िक्र श्री फ़ुरसतिया ने किया है - यानी छापक पेड... उसे मैं यहां पहले जारी कर चुका हूं.

दुनिया से मिटाएं मुझे या दिल से भुलाएं...फ़िल्म: वामक़ अज़रा


काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाय...फ़िल्म : अनोखी अदा

Monday, December 10, 2007

ये हैं त्रिलोचनजी: मृत्यु से कोई दस घंटे पहले लिखने की कोशिश में


Trilochan, December 9,2007 Morning
Photo: Pankhuri Singh

जो नहीं सुन पाए त्रिलोचन की बातें


त्रिलोचन जी से मुलाक़ात का सचित्र विवरण और उनकी कुछ रचनाएँ आप पहले भी यहां पढ चुके हैं.
लीजिये सुनिये कोई बारह साल पुरानी रिकॉर्डिंग का एक हिस्सा. बातचीत कर रहे हैं समकालीन जनमत के संपादक रामजी राय और बीच में एक आध सवाल चन्द्रभूषण के हैं. यह जमावडा जनमत के बी-30, शकरपुर वाले ऑफ़िस में रोज़ कुछ नये गुल खिलाता था.
रिकॉर्डिंग की दयनीय अवस्था हमारी मुफ़लिसी और शानदार फ़क़ीरी का दस्तावेज़ है. सुनते समय क्लैरिटी का अभाव महसूस हो तो बूढ-पुरनियों की बात का स्मरण कीजियेगा कि 'घी का लड्डू टेढै भला.'


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Dur. 29Min 43Sec

वरिष्ठ कवि त्रिलोचन से बातचीत का शुरुआती हिस्सा आप सुन चुके हैं. अब सुनिये इस बातचीत का दूसरा हिस्सा. साउंड में क्लैरिटी का अभाव है, इसके लिये हमें खेद है.
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यह पोस्ट 29 और 30 नवंबर, 2007 को यहाँ जारी की जा चुकी ह. त्रिलोचन जी को श्रद्धांजलि स्वरूप पुनः उनकी स्मृति को समर्पित.

Sunday, December 9, 2007

सुनहरी यादों का क़ाफ़िला: एक रंगकर्मी के रिफ़्लैक्शंस

इंटरव्यू को फ़ाइनली जारी करने से पहले मेरा फ़र्ज़ था कि विमलजी को उसे सुनवा देता ताकि इतने दिनों बाद सेकंड थॉट में कुछ बातों को अप्रासंगिक या संदर्भच्युत होने के कारण हटा देना चाहें. सो मैंने उन्हें भेज दिया. इन दिनों वो अपने घरेलू मोर्चों पर व्यस्त हैं इसलिये इस इंटरव्यू को सुनने का वक़्त मुश्किल से निकाल पाए.
रात उनका जो जवाब आया उसे यहाँ पेश कर रहा हूँ. ताकि बुनियादी तौर पर आदमी की पहचान हो सके. वो जैसे कल थे वैसी ही बिंदास मस्ती में उन्होंने इस पॉड्कास्ट को अप्रूव कर दिया है, यह कहते हुए कि यह विमल की विमल से मुलाकात है.

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भाई इरफ़ान,
अच्छा लग रहा है इसी बहाने पुराने दिन याद आ रहे हैं, मैने ऑडियो सुना सुखद है कि आपने इन सारी चीज़ों को बड़ा सम्हाल के रखा हुआ है,पर जो पोस्ट हो रहा है पता नहीं लोगों की कितनी दिलचस्पी है इन बातों में? क्योकि जिस विमल टुमरी वाले की आप बात कर रहे हैं, वो कोई असाधारण कार्य तो नहीं ही कर रहे हैं... और जो उन्होने पिछली ज़िन्दगी जी है..... उसका कुछ ज़्यादा महिमामंडन तो नही हो रहा ? फिर भी आपको लग रहा है चीज़ें सामने आनी चाहिये तो भला मैं कैसे एतराज़ कर सकता हूं.....
-विमल
पुनश्च : और एक बात तो रह गई....... कल रात मैने सुना जो पन्द्रह साल पहले विमल ने कहा था, इन पन्द्र्ह साल पुरानी बातों को सुनकर लगा आज जो विमल है आपके ठुमरी वाले वो इस विमल से एकदम अलहदा हैं, अरे इरफ़ान बहुत से शब्द भी ऐसे थे जिनका इस्तेमाल आज तो मैं करता ही नहीं हूं,
पर पन्द्रह साल पुराने विमल से सामना कराने के लिये वाकई आपका धन्यवाद जिसकी बहुत सी बातें तो ऐसी लग रही थी कि जैसे मै उन्हें पहली बार सुन रहा था विमल की विमल से मुलाकात के लिये शुक्रिया !!




ये एक रंगकर्मी है, जिसने अपनी ज़िंदगी के सबसे ज़्यादा ऊर्जावान वर्षों को एक ख़ास सरगर्मी के बीच गुज़ारा. कहने को इस सरगर्मी का नाम रंगकर्म था लेकिन अगर वो सिर्फ रंगकर्म होता तो बताने को इतनी बातें और सुलझाने को इतने सवाल न होते. ये एक मुकम्मल ज़िंदगी थी और जो समाज के ज्वलंत सवालों से मुँह न मोडती थी. अंग्रेज़ी के शब्द cultural squad की ध्वनि देता हुआ एक ग्रुप, जिसका नाम दस्ता था - लंबे समय तक ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश और आम तौर पर समूचे हिंदी भाषी इलाक़े की धडकन बना रहा. नुक्कड नाटकों और गीतों के अलावा पोस्टर प्रदर्शनियाँ, प्रकाशन और पठन-पाठन के विभिन्न सत्र इसके समूचे क्रियाकलाप का अभिन्न हिस्सा थे. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और इसके सभी कॉलेज इसकी गतिविधियों का केंद्र थे.
फिल्म-क्लब, प्रयाग संगीत समिति में होने वाले नाटकों के आयोजन और साहित्यिक जमावडों से इस ग्रुप की अनुपस्थिति प्राय: अकल्पनीय थी.इस तरह कोई भी सांस्कृतिक हलचल दस्ता की धमक से अछूती नहीं थी. इसमें कच्चे-पक्के सैद्धांतिक सवालों से लेकर एक युवावस्था की हुर्र-फुर्र और इश्क-मुश्क सब शामिल था. बीच-बीच में ऐसे मौक़े भी आते जब ग्रुप का अस्तित्व ही संकट में पड जाता. एक सक्रिय छात्र आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन की राजनीतिक हलचलें ऐसे में इसे एक नया जीवन देतीं.
सब स्टूडेंट्स थे और ये सभी लोग अलग-अलग सांस्कृतिक-सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से आते थे. मन को तरंगित करने और अपनी-अपनी भूमिकाओं से संतुष्टि के अलावा एक चीज़ जो अक्सर छूट जाया करती थी और जो चीज़ हज़ार आश्वस्तियों पर भारी होकर सामने आ खडी होती थी वो थी भविष्य की चिंता. अनेक प्रेम प्रसंगों और प्यार निभाने के तमाम वादों ने, भविष्य की इन्हीं अनसुलझी लटों में लिपटकर दम तोडा ही. साथ ही उनके उस प्यार को भी चौराहे पर ला खडा किया, जो सिर्फ़ थियेटर को अपना पहला और आख़िरी प्यार मानते थे. दूरगामी योजनाओं को अमली जामा पहनाने और काम को सस्टेनेबल बल्कि सेल्फ सस्टेनेबल एक्सरसाइज़ बनाने के भी कई कॉम्बीनेशन पर्म्यूटेशन आज़माए जाते लेकिन व्याहवारिक सवालों की सख़्त ज़मीन पर उन्हें देर तक सहारा न मिलता. शायद ऑब्ज़र्वर्स इस बात पर सहमत होंगे कि जितना समय भी यह प्रयोग चला उसमें इस ग्रुप की अपार सहनशीलता, ज़िद और तरुणाई का रोमैंटिसिज़्म प्रमुख तत्व रहे. जब तक संभव बना इस ग्रुप ने अपनी रचनाशीलता और सक्रियता के बल पर एक पूरे दौर को एक अद्भुत रसास्वाद से भरा. इन पंक्तियों के वे पाठक जो इतिहास गवाह है, राजा का बाजा, घेरा, जनता पागल हो गई है, कल भात आयेगा, बकरी, स्पार्टाकस, हत्यारे, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर वग़ैरह नाटकों और गीतों के दर्शक भर रहे हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि उनकी स्मृति में यह सब कुछ एक खुशनुमा याद की तरह अब भी ताज़ा है और यह भी कि उस अनुभव ने उन्हें समृद्ध किया है.
साइकिलों पर सवार कुछ लडके अभी किसी चाय की दुकान पर उतरे हैं. अभी कुछ और का इंतज़ार है. क्यों न चाय का एक दौर चले! आसपास की दुकानोंवाले और राह चलते लोग भी इनकी सूरतों से वाक़िफ़ हैं. एक सुगबुगाहट फैल गयी है कि नाटक होगा. हालाँकि नाटक जैसा कुछ दिख नहीं रहा है. कंधे पर लटके थैलों में क्या है यह किसको मालूम. चाय का दूसरा दौर भी चलता है क्योंकि जिन्हें आना था वो भी आ गये हैं.
तभी एक-एक डफ़ली लेकर उस चौराहे के दोनों तरफ दो लोग बढ चले हैं... सुनो...सुनो...सुनो... अभी थोडी ही देर में आप को यहां एक नाटक दिखाया जायेगा....सुनो...सुनो...सुनो
ये एजी ऑफिस चौराहा है, जहाँ लंच टाइम में इधर-उधर लोग बैठे हैं या टहल रहे हैं..धीरे-धीरे भीड बढने लगती है और थोडी ही देर में दो तीन गीतों के बाद नाटक शुरू हो जाता. एक गोल घेरे के बीच अभिनेता अपनी अपनी भूमिकाओं में...
नुक्कड से लेकर प्रोसीनियम तक वर्षों चले इस सिलसिले की निशानियाँ हम सब के साथ रहेंगी.

शुरुआती दस्ता के सदस्य विमल, अमरेश, उदय, उमेंद्र, प्रमोद और अनिल.

पिछली दो पोस्टों में मैने यहाँ इस ग्रुप के एक चहेते एक्टर विमल की कुछ रिकॉर्डिंग्स आपको सुनवाई थीं जो इस मूल इंटरव्यू का टीज़र थीं. आइये सुनें इस एक ही सिटिंग में हुई बातचीत को दो हिस्सों में.


इलाहाबाद पहुँचकर मुझे जीने का एक मक़सद मिला...



मैं बहुत से लोगों का दोस्त हूँ, मेरा कोई दोस्त नहीं...

Saturday, December 8, 2007

सुनिये विमल भाई से एक कविता और दो गीत

कल मैंने वादा किया था कि आपको विमल भाई से हुई बातचीत सुनवाऊंगा. अभी थोड़ा और इन्तज़ार कीजिये और इस बीच सुनिये उसी पंद्रह-सोलह साल पुरानी रिकार्डिंग से ये गीत.

सिविल लाइंस ,इलाहाबाद. एक चाय की दुकान पर बीस साल पहले ठहरे कुछ ठहाके


मेरा बाप अर्जुन नहीं था...

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समय का पहिया चले रे साथी...

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फूलों के रंग से दिल की क़लम से...