दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।
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Thursday, March 26, 2015

मुहम्मद यूसुफ पापा-3


मुहम्मद यूसुफ पापा के साथ जिस मुलाक़ात का मैंने यहाँ ज़िक्र किया उसमें हमारे फ़िल्मकार साथी नितिन भी थे और हम इस इरादे से गए थे कि पापा की वीडियोग्राफी कर लेंगे और अगर चीज़ें फेवरेबल रहीं तो उन के बारे में कोई प्रोग्राम बनाने की सोचेंगे. नितिन ने बड़े मनोयोग से शूटिंग की और हम इस मुलाक़ात से खुश तो लौटे पर शायद उनकी स्मृति क्षीण होने से पहले पहुंचते तो उनकी बातें ठीक से दर्ज कर पाते। वो बार बार अपनी ही लिखी कुंडलियों में से एक कुंडली की लाइने बेतरतीब ढंग से दुहरा रहे थे. मतलब किसी भी वाक़ये का ज़िक्र करते हुए उसके आगे या पीछे या कभी बीच में या कहीं भी कह उठते- 'जब कुछ भी ना बन सको, अध्यापक बन जाव' और चुप हो जाते। फिर इधर उधर की बातें करते हुए बीच मे कहते- 'झूठे युग में कथा सुनाओ, तुम सच्चों की' … और ऐसा हमारी उस मुलाक़ात में उसी तरह हो रहा था जैसा देवेन्द्र सत्यार्थी के साथ इस मुलाक़ात में. बहरहाल उनकी तस्वीर का एक छोटा सा स्केच उनका यहां पेश है जो उनकी किताब 'पापा की कुंडलियाँ' से लिया गया है. और ये रही उनकी वह कुंडली जिसका ऊपर ज़िक्र है.
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जब कुछ भी ना बन सको, अध्यापक बन जाव। 
घाट-घाट पानी पियो, खरिया मिट्टी खाव।। 

खरिया मिट्टी खाव, नाक पोछो बच्चों की। 
झूठे युग में कथा सुनाओ, तुम सच्चों की।। 

कह 'पापा' कविराय, यही केवल कहते सब । 
गर्दन नीची करो, प्रिंसिपल कुछ बोले जब ।।
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'पापा की कुंडलियाँ' नाम की किताब में मुहम्मद यूसुफ पापा की 186 कुंडलियाँ हैं जो पांच अलग अलग भावों की श्रेणी में संजोई गयी हैं. किताब की शुरुआत में एक हम्द (ईश वंदना) है और एक नात (पैग़म्बर की प्रशंसा में) भी कुंडली की ही शक्ल में हैं. यहां पेश है वह नात :-

बासी तैबा देश के, तुझ पर कोटि सलाम। 
भेज रहा है प्रेम हित, तेरा पतित ग़ुलाम ।। 

तेरा पतित ग़ुलाम, धूल चरनों की मांगे। 
धन, दौलत, सुत, प्रान, जायँ बलि तेरे आगे ।। 

कह पापा कविराय, आँख दर्शन की प्यासी। 
करो दया की दृष्टि, बुलालो तैबा वासी ।।

Saturday, March 21, 2015

मोहम्मद यूसुफ़ पापा-2

मेरे गीत चटपटे छोले हैं
मेरे गीत चटपटे छोले हैं

ये हरे खेत के चुने हुए
ये भड़भूजे के भुने हुए
हल्दी से रंगे ये पीले हैं
ये चितकबरे और धौले हैं

मेरे गीत चटपटे छोले हैं

मेरे गीतों में झनकार भी है
आदर्श भी है ललकार भी है
गुंजार भी है महकार भी है
कुछ रूप भी है आकार भी है
मेरे गीत सत्य ही बोले हैं

मेरे गीत चटपटे छोले हैं

मेरे गीतों में आसानी है
मेरे गीत भैंस की सानी हैं
शरबत हैं, मीठा पानी हैं
इनमें इस क़दर रवानी है
ये ठोस भी हैं और पोले हैं

मेरे गीत चटपटे छोले हैं

मेरे गीत दूध के धोए हैं
इनमें क़हक़हे समोए हैं
जो शब्द गीत में बोए हैं
मोती की तरह पिरोए हैं
ये सबके लिये हिंडोले हैं

मेरे गीत चटपटे छोले हैं

मेरे गीत में सुर है ताल भी है
आकाश भी है पाताल भी है
मंसूरी नैनीताल भी है
इकताल भी है झपताल भी है
ये कानों में रस घोले हैं

मेरे गीत चटपटे छोले हैं.

Friday, March 20, 2015

मुहम्मद यूसुफ़ पापा


मुहम्मद यूसुफ़ को उनके जीवन के आख़िरी बरसों तक मुहम्मद यूसुफ़ पापा के नाम से जाना गया. साल 2011 की आती सर्दियों में जब हम उनसे मिलने गये तो वो बातें दुहराने लगे थे लेकिन इससे क्या. उनसे मिलना एक ग़ैरमामूली इंसान से मिलना था. उर्दू, हिंदी और भोजपुरी में समान अधिकार से लिखने वाले मुहम्मद यूसुफ़ के नाम के साथ पापा जुड़ना उनके बाल लेखन की वजह से हुआ. उनके समकालीन बालक राम नागर आज भी उन्हें बड़े प्यार से याद करते हैं क्यों कि बरसों तक आकाशवाणी में बच्चों के प्रोग्राम करते-करते खुद बच्चा बन चुके बालक राम नागर ने मुहम्मद यूसुफ़ की रचनाओं में वह विलक्षणता देखी थी जो उन्हें बचकाने होकर बच्चों का लेखक बन जाने से रोकती थी. उर्दू में 'चिलमनामा', भोजपुरी में 'अपने हो गईलैं बेगाना', 'पापा के भोजपुरी लोकगीत' और 'पापा की कुंडलियां उनकी वो किताबें हैं जिन्हें मैं जानता हूं. उनकी मातृभाषा भोजपुरी ही थी. उप्र के बस्ती ज़िले में बसडीला गांव उनका पैत्रिक गांव था जो तहसील ख़लीलाबाद में पड़ता है. बस्ती से हाई स्कूल, गोरखपुर से इंटर्मीडियेट करने के बाद उन्होंने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीएससी और एमएससी किया. जब हमारी मुलाक़ात उनसे हुई तो वो जामिया नगर के अपने मामूली घर में रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. फीज़िक्स-अध्यापक के रूप में वो जामिया हायर सेकंडरी स्कूल से रिटायर हुए थे. आज नागर जी से उनका ज़िक्र छिड़ा तो पता चला कि वो अब नहीं रहे. देर से ही सही उन्हें श्रद्धांजलि.
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यहां उनकी वह कविता देता हूं जो मुझे नागर जी से हासिल हुई थी. ये कविता उन कई कविताओं में से एक है जो उन्होंने नागरजी के लिये उनके बच्चों के प्रोग्राम में पढी थी और जो मुझे बेहद पसंद है.
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चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं. 
इंसान संवरने में फुदके 
अश्नान के करने में फुदके 
पानी के भरने में फुदके 
सीढ़ी से उतरने में फुदके 
वादे से मुकरने में फुदके 
चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं. 
सोचूं तो ध्यान फुदकता है 
आतमसम्मान फुदकता है 
घर में मेहमान फुदकता है 
खेतों में धान फुदकता है 
खाऊं तो पान फुदकता है 
चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं. 
पेड़ों की डाल फुदकती है 
घोड़े की नाल फुदकती है 
कंधे पर शाल फुदकती है 
चलने में चाल फुदकती है 
चावल में दाल फुदकती है 
चिड़ियों का फुदकना क्या देखा, हर वक़्त फुदकता रहता हूं.
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