ये बयान है एक दौर का. एक दौर जो हर संस्कृतिकर्मी की ज़िंदगी में आता है. आप मुख़ातिब हैं विमल वर्मा से जिन्हें आपमें से ज़्यादातर लोग ठुमरीवाले विमल के रूप में जानते हैं. आपमें से थोडे से लोग उनके बारे ये भी जानते हैं कि उनकी ज़िंदगी के तार आज़मगढ, बलिया, दिल्ली और अब बंबई से जुडे होने के अलावा अपनी सांस्कृतिक सरगर्मियों के ज़माने से समूचे देश से जुडे हुए हैं. भौगोलिक विस्तारों से कहीं अधिक उनकी पहुंच इंसानी दिलों और धडकनों तक है. जो भी उनसे कभी भी, कहीं भी और कितना भी मिला है - उन्हें भूल नहीं सका है. उम्मीद करता हूँ कि यह ख़ासियत उनमें अब भी बरक़रार है. मेरे और उनके रिश्तों की दिलकश यादों पर वक़्त की धूल अभी इतनी भारी नहीं पडी है कि मैं यह पोस्ट जारी करने से पहले इसे भावुकता आदि के ख़तरों से बचाऊँ. ये डर मुझे खाये जाता है कि मैं इस वक़्त उनकी तारीफ़ में जो भी लिख रहा हूं वो कहीं मेरे अहसास की अक्कासी कर भी पा रहा है या नहीं. वक़्त के साथ-साथ हर इंसान समझदार और प्रैक्टिकल बनता जाता है, लेकिन विमल भाई के सिलसिले में वैसा ही मिट्टी का माधो रहना चाहता हूं जैसा कि मैं आज से तेईस साल पहले था जब गर्मियों की एक दोपहर, मेरी मुलाक़ात प्रमोद भाई और विमल भाई से हुई थी. वो वक़्त और वो तजुर्बे मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं और मेरी शानदार नाकामी जैसी कामयाबी की नींव हैं. प्रमोद भाई के साथ गुज़रे वक्त को मैं इस और इस तरह पहले यहां दर्ज कर चुका हूं. एक मज़ेदार यारबाश आदमी का अगर कोई जीता-जागता नमूना हो सकता है तो वो विमल भाई हैं जो आपको हँसाते-हँसाते रुला देने और अगर आप रो रहे हों तो आपको फौरन एक नयी दुनिया में पहुँचाने का माद्दा रखते हैं. मेरे लिये वो एक समर्थ अभिनेता और संगठक के अलावा एक ऐसे इंसान भी हैं जिसका कोई तीसर नेत्र होता है. लेकिन ठहरिये... कुछ लोग जो इन लाइनों को पढते हुए "हद हो गयी"... "अरे बहुत फेंका अब लपेटो" "अतिरंजना" आदि कह रहे हैं उन्हें मैं पहले एक गाली लिख दूँ - #)ं&()%$$$#@।+! तो हाँ...विमल भाई का जीवन संघर्षों से भरा है और इसमें न तो उन्हें और न हमें आपको कोई उल्लेखनीय बात लगनी चाहिये. एक बातूनी आदमी, जिसके पास अनुभवों का महासागर है, यही सोच कर यह बातचीत कोई पद्रह साल पहले दिल्ली में तब रिकॉर्ड कर ली गयी थी जब हमारे दोस्त संजय जोशी को अपने एमसीआरसी का एक ऑडियो रिकॉर्डर हाथ लगा था. बातचीत महज़ एक सवाल के इर्द गिर्द थी कि आपकी ज़िंदगी का कोई अधूरा ख्वाब है तो वो क्या है? बातचीत आपको सुनवाऊंगा लेकिन फिलहाल सुनिये इस बातचीत के आखिरी हिस्से में सुनाए उनके गीतों मेँ से पहला गीत- यह सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के लिखे उन गीतों में से एक है, जिन्हें हमनें आंदोलनों और नाटकों के आगे पीछे ख़ूब गाया. ----------------------------- यहां मौजूद दोनों फ़ोटो नवीन चंद्र वर्मा ने कोई बीस साल पहले खींचे है, नवीन उर्फ़ गुड्डा विमलभाई के छोटे भाई और जानेमाने कैमरामैन हैं. ऊपर बाएं विमल और दाएं प्रमोद. तीसरा मैं तब था जब २३ साल पहले विमल भाई वगैरह से मिला. --------------------------------------------------- आग लगा दो, आग लगा दो राजाजी के प्याऊ को...
"ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त" नाम की इस पोस्ट में कल आपमें से जिन मित्रों ने यहाँ पाँच गानों तक प्रोग्राम का लुत्फ उठाया था उनके लिये आगे का हिस्सा चाहें तो वहीं पढें. आप सभी का आभार जो कल यहाँ आए और मीनाक्षी का जो यहाँ सुकून पाती हैं.
चलते-चलते नन्हें-नन्हें पाँव थक जाया करते थे.एक ख़ाब जो मैं अक्सर देखा करता था, वो ये था कि मेरे दोनों हाथों की जगह दो बडे-बडे पंख हैं और मैं उडता-उडता स्कूल पहुँच रहा हूँ.
एक लंबी कभी न ख़त्म होनेवाली पगडंडी मुझे ख़ूबसूरत पहाडों की तरफ़ ले जा रही है.रास्ते में ऊँचे घने पेड हैं, एक झरना वहाँ लगातार गिरता रहता है,चिडियों का एक झुंड अभी-अभी उडा है और एक चंचल हिरन कुलाँचे भरता हुआ सामने से गुज़र गया है. मैं हर रात ऐसे ही एक सपने में - घूमा किया - तब मैं बहुत छोटा था.
सपने में मैं बहुत अकेली होती हूँ और तभी एक जंगली भैंसा मुझे दौडाने लगता है, मैं भागने की कोशिश करती हूँ लेकिन मेरे पैर जैसे कहीं जम जाते हैं, मैं दौड नहीं पाती. Thanks God तभी मेरी आँख खुल जाती है - मैं पसीने से लथपत उठ बैठती हूँ.
मेरे तो exams हो रहे होते हैं और मैं अक्सर लेट पहुँचती हूँ. कभी-कभी ऐसा भी देखा कि पेपर कुछ और था और मैं तैयारी कुछ और करके आई...
बात जब ख़ाबों की शुरू हुई - और वो भी बचपन में आने वाले ख़ाबों की - तो कुछ इसी तरह से दोस्तों ने अपने सपनों को याद किया.
कुछ के लिये तो अब सपनों का ज़िक्र भी एक अटपटा प्रसंग है. यानी वर्तमान में इस तरह उलझा हुआ है मन कि लौटकर जाना और वो भी सपनों में, कठिन तो है ही, अप्रीतिकर भी है.
जो भी हो... ग़ौर किया तो पाया कि हर किसी की ज़िंदगी से जुडे हैं ख़्वाब - कभी रात की नींदों से आते हुए तो कभी दिन के उजालों में बुने जाते हुए.
कोई ख़ाब क्यों आया? उसकी ताबीर क्या है? मन कभी इस पर सोचता है, तो कभी इसके अहसास से घंटों, तो कभी हफ्तों लुत्फ़अंदोज़ होता रहता है.
अच्छा क्या था बुरा क्या? सही क्या था ग़लत क्या? ख़ाबों के नफ़े-नुक़सान की बातें - ये सब उम्र के एक पडाव पर ही तौले जाते हैं या कभी-कभी नहीं भी तौले जाते. बचपन से हम लडकपन में क़दम रखते हैं और फिर जवानी की सीढियाँ चढते हुए आज की ज़बान में कहें तो सीनियर सिटिज़ेन होते हैं - इस तरह ज़िंदगी का एक सफ़र:-
पाने की तमन्ना - पाने की कोशिश और पाए हुए की तफ्तीश करता हुआ अपने मक़ाम पर पहुँचता है.
इतवार का एक और दिन...
बहुत पीछे और बहुत आगे को खँगालने और explore करने का एक और अवकाश एक मौक़ा ख़ुद से मुख़ातिब होने का... कुछ लम्हे अपने लिये,
प्रोग्राम है रेडियो रविवार और मैं इरफ़ान .
मेज़ पर ताश के पत्तों सी सजी है दुनिया कोई खोने के लिये है कोई पाने के लिये ----------------------------
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बचपन के दिन - मस्ती और बेफ़िक्री के दिन.
हर रोज़ नए ख़ाब पलते हैं, दुनिया की सारी ख़ुशियाँ अपने दामन में समेट लेने का अहद होता है.
क्लासरूम में सबसे पूछा जा रहा था --
I want to become a great poet and writer. मुँह से बेसाख़्ता निकला था.
मुझे ज़माने की भेडचाल पसंद नहीं. जिसे देखो वही डॉक्टर इंजीनियर, वकील, टीचर...
ठीक !
लेकिन अब सोचता हूँ तो poet and writer ठीक लेकिन ये great poet and writer? बात कुछ हज़म नहीं होती!
"बाप न मारे पेंडुकी बेटा तीरंदाज़" एक फ़िकरा कहीं से उडता हुआ आता है और टनाक से लगता है. सपने संकल्प का रूप लेते हैं.
क्या हुआ? क्या खोया? क्या पाया? - यानी ये सब जोड-गुणा के लिये भी एक उम्र की दरकार थी...और इस उम्र के ये ज़रूरी पडाव थे.
हर शै जैसे बिल्कुल नयी थी और जैसे हमने ही उसे पहली बार देखा था. किसी ने देखा भी था तो ये हमारे सरोकार का वैसा हिस्सा नहीं थी.
यानी ख्वाबों के चिराग़ दिल की परतों के नीचे रौशन हो रहे हों, पलकों पर सजे हर पल नयी रौशनियाँ बिखेर रहे हों या फिर ज़ाहिर होकर एक guiding force की तरह काम कर रहे हों --
हर रंग में और हर हाल में हमें इंसान होने का अहसास कराते हैं.
शायद यही हैं जो हमें थककर बैठने नहीं देते - ------------------
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एक ख़्वाब जो बहुत मेरा है, अज आपके साथ share करता हूँ.
इसमें एक बलखाती-मचलती नदी है, सर्दियों की गुनगुनी धूप है और मैं इस नदी की सतह पर पीठ किये लेटा हूँ. नदी जहाँ-जहाँ जा रही है मैं आसमान की तरफ मुँह किये हुए लेटा एक अनजाने सफर पर निकल पडा हूँ.
हक़ीक़त से कोसों दूर. कभी न पूरा हो सकने वाला ख़्वाब.
सवाल ये उठता है कि क्या ख़्वाब इसलिये होते हैं कि उन्हें पूरा होना है?
सवाल ये भी उठता है है कि क्या ख़्वाब देखना आपके बस में होता है? वग़ैरह-वग़ैरह.
सवाल समझदार लोग उठाते हैं. ये शायद उन्हीं की field है. फिर शायर उनसे हँस कर कह देता है -
दो और दो का जोड हमेशा चार कहाँ होता है सोच समझ वालों को थोडी नादानी दे मौला. ----------------------
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एक बात जो हमेशा दुहराई जाती है यानी जिसे हमने अभी या कभी ज़रूर सुन रखा है वो ये है कि यथार्थ की कठोर चट्टान से टकरा कर सपने टूट जाते हैं. बात ठीक है लेकिन इस बात का दिलचस्प पहलू ये है कि इसी यथार्थ को खरिज करते हुए, इसके घटाटोप से बाहर आने के किये स्वप्न एक ज़रूरी सामान रहे हैं और रहेंगे.
यथार्थ की एक ऐसी दुनिया में- जहाँ सब कुछ systematic और controlled है -- एक individual अपनी essential subjectivity assert करता है और इस तरह अपेक्षाओं और बने बनाए मानदंडों पर खरा न उतरने से बहिष्कृत कर दिये जाने से बच जाता है. इस तरह पराएपन के अहसास में जीने के बजाय वो अपनी एक निजी दुनिया चुन लेता है. जिसमें कुछ समय के लिये ही सही सुरक्षित और महफूज़ महसूस करता है.
शायद यही वजह है कि हम अक्सर कहीं पर होते हुए भी वहाँ नहीं होते हैं. बहरहाल हम जहाँ भी होते हैं वहाँ हम वो तलाश कर रहे होते हैं जिसे हम दिल के बहुत नज़दीक पाते हैं. ------------------
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योजनाएँ बहुत देर तक बनती रहीं. उनमें से कुछ ज़मीन पर थीं तो कुछ हवा में.
आख़िर कब तक ख़ामोश रहते -- बालकनी में अख़बार से सिर जोड़कर बैठे दादाजी से रहा नहीं गया --
"तुम लोग बातें ज़्यादा करते हो, काम कम. कुछ करो तो समझ में आये कि हाँ कुछ हुआ. और याद रखो वक़्त से पहले और क़िस्मत से ज़्यादा किसी को नहीं मिलता. "
बात ठीक होगी शायद क्योंकि बाल उन्होंने भी धूप में सफेद नहीं किये. सीख की बातें दे सकते हैं क्योंकि उन्होंने ज़माना देखा है.
लेकिन कोई इनसे पूछे कि यही बात जब आपके दादाजी कहते थे यानी जब आप हमारी उम्र के थे -- तो क्या आपने मानी थी.
ये शायद इंसानी फितरत है कि अनुभवों का एक ज़ख़ीरा उसमें वो आत्मविश्वास भरता है कि ख़ुद से पहले की पीढियों को वो बचकाना और कभी-कभी अहमक़ाना समझने लगती है. हर चीज़ को, हर इंसान को उसके परिवेश में देखें तो हर बात समझ में आने लगती है लेकिन इस सबके बीच समय का फ़ासला निष्कर्षों को कभी ग़लत ठहराता है तो कभी सवाल छोड जाता है.
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--------------------- जागती आँखों के ख़ाब एक लाइट हाउस की तरह होते हैं. हर हार के बाद दिल को हौसला देते हुए. कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारी इच्छाएं ही सपनों का रूप धारण कर लेती हैं.
हर इंसान की ज़िंदगी में उसकी युवावस्था उसकी सर्वाधिक ऊर्जा का और ड्राइव का समय होता है.
"अगर अब तक कुछ नहीं किया तो कब करोगे?" पूछा जाता है. पैरों में एक रफ़्तार, दिल में एक उमंग और सब कुछ पा लेने का, समेट लेने का जज़्बा-
स्वामी विवेकानंद ने कहा - "इच्छाओं का समुद्र अतृप्त रहता है. ज्यों-ज्यों उसकी मांगें पूरी की जाती हैं, त्यों-त्यों वो गर्जन करता है." यानी एक बार फिर ज़िंदगी की जद्दोजहद का एक फ़लसफ़ाना निचोड़.
जो भी हो, जब तक दम-ख़म है, हारें क्यों? बाद में क्या होगा, किसने जाना? हर इंसान को एक ही जीवन मिला है और इसके सभी जौहर यहीं और इसी जीवन में सामने आने है- सारी कोशिशों का निचोड़ यही है कि ख़ाब मुरझा न जाएं...कहीं रूठ न जाएं. ---------------------
--------------------- जब हम छोटे होते हैं तो सपने देखते हैं जब हम बड़े होते हैं तो सपने देखते हैं सपनों का रूप बदलता रहता है और हम हर दौर में उन्हें अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं. कहते हैं कि सपने हमारी अधूरी इच्छाओं को भी प्रतिबिंबित करते हैं. फिर ऐसा पड़ाव भी आता है जब हम प्रौढ़ या कहें मैच्योर हो जाते हैं. यानी सपनों की चीरफाड़ कर सकनेवाले. लेकिन कोई दावे से नहीं कह सकता कि इस उम्र में सपने नहीं होते. वो तो होते हैं और उन्हें हम अपने जीते जी पूरा भले न कर पाएं - हम उन्हें सजा देते हैं - आनेवाली पीढ़ी की आंखों में -- ---------------------
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"मेरा नाम सृजित है. मेरा सपना था कि मैं एक बड़ा आदमी बनूं- जैसे कि पायलट, सायंटिस्ट या चित्रकार. असल में मेरे सायंस और ड्रॉइंग में अच्छे नम्बर आते थे. 12th में पता नहीं क्यों मेरे अच्छे नम्बर नहीं आए और कुछ बैड लक ऐसा रहा कि मेरा कोई सपना पूरा नहीं हो पाया. आज मैं यहां दिल्ली में एक इंश्योरेंस एड्वाइज़र हूं यानी आप समझ लीजिये कि मेरी लाइन ही चेंज हो गयी. मेरा जो बचपन का सपना था वो तो अब मिट गया है. मैं आज ज़्यादा प्रैक्टिकली सोचता हूं और अब जो मेरा सपना है मतलब अब जो मैं चाहता हूं वो ये कि मैं लाइफ़ को ठीक से फ़ेस करूं; कुछ पैसा कमाऊं. मेरी कुछ कमियां रही होंगी ज़रूर ही...लेकिन मुझे लगता है कि मुझमें कुछ अच्छाइयां भी हैं - अब उन्हीं अच्छाइयों को पहचानने में लगा हूं...और अब मैं कुछ स्पिरिचुअल भी हो रहा हूं."
ये शब्द हैं सत्ताइस वर्षीय सृजित के...जो उसने मुझसे कल रात कहे.
शायद इन शब्दों में आपको भी अपनी आवाज़ सुनाई दे - -----------------------
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"ज़िंदगी में कोई दो ही मौक़े दुख से भरे होते हैं - .....एक है इच्छाओं का पूर्ण हो जाना और .....दूसरा इच्छाओं का अपूर्ण रहना."
ऐसा कहते हैं जॉर्ज बर्नाड शॉ .
सपनों को इच्छाओं का पर्यायवाची मान लें तो बर्नाड शॊ ने बड़ी असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी है.
शायद इसी लिये एक जनाब का कहना है कि जिसे हम सपना कहते हैं उसे हमें जीवन के एक लक्ष्य के रूप में देखना चाहिये और जैसे ही ये लक्ष्य, ये मक़सद तय कर लिया जाएगा-- इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि वह पूरा हुआ या नहीं - उसको पूरा करने की कोशिश में लगे रहना, उसके लिये चलते रहना ही असली आनंद है...तो चलिये...चलते रहिये. --------------------
जब कोई चार महीने पहले ये प्रोग्राम मुझे मिला तो मेरी बाँछें खिल गईं. वैसे भी एफ़एम गोल्ड, यानी दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो का 106.4 मैगा हर्ट्ज़ पर गोल्डेन इरा के म्यूज़िक का ख़ास चैनल, सुनने वालों के लिये एक अलग आकर्षण रखता है क्योंकि किसी भी घंटे में अगर आपको सन 50-60 का सुरीला-मधुर संगीत सुनना हो तो ये चैनेल आपको निराश नहीं करता. फिर पुराने दौर की फिल्मों और फिल्मी हस्तियों को बडे ही रोचक ढंग से यहाँ याद भी किया जाता है. ज़्यादातर प्रज़ेटर्स 25-30 साल के आयु वर्ग के हैं लेकिन अपने पैशन और चैनल की ज़रूरतों के मुताबिक़ हर क्षण कुछ नया जोड रहे होते हैं. इस तरह वर्तमान को अतीत की हलचलों से समृद्ध करने की एक सतत कार्रवाही यहां जारी है.
मेरे लिये इस चैनल पर प्रोग्राम करना हमेशा ही इसलिये भी एक्साइटिंग रहा है कि एक तो यहां कहने के लिये कुछ स्पेस है और दूसरे यहां प्ले किया जाने वाला म्यूज़िक मेरे निजी संग्रह से मेल भी खाता है. संगीत को लेकर मेरे दीवानेपन की अनेक कहानियाँ कही जाती हैं जिनमें कई अतिरंजना से भरी हुई हैं. मैं जब सचमुच संगीत प्रेमियों और संगीत संग्राहकों से अपने शो के दौरान बात करता हूं तो अहसास होता है कि मैं अपनी रुचियों और संग्रह की सीमाओं में किस क़दर क़ैद हूं.
बहरहाल जो भी टूटा-फूटा और सीमित संग्रह मैं कर सका हूं और कर रहा हूं उसका मज़ेदार पहलू यह है कि मेरे पास यह रोचक प्रोग्राम है जिसका नाम है दिल ने फिर याद किया. प्रोग्राम का संकल्प है कि इसमें फिल्म संगीत और फिल्म इतिहास के बीते दौर की यादें ताज़ा की जाएंगी. यहां तक तो ठीक है कि फिल्मों के इतिहास और व्यक्तियों के एनेक्डोटल इंस्टैंसेज़ किताबों और पत्र-पत्रिकाओं मे कुछ हद तक ढूंढे से मिल जाते हैं लेकिन इस तरह के शोज़ कोरैबोरेटिव गानों के बग़ैर क्या हो सकते हैं. एक ख़ुशफ़हमी ये भी है कि कैसा भी फिल्म संगीत ऑल इंडिया रेडियो की रिकॉर्ड लायब्रेरी में तो होगा ही जबकि सच्चाई ये है कि यहां कुछ भी नहीं है. अगर हम मूक फिल्मों के दौर के फौरन बाद के कोई बीस बरसों के गाने तलाशें तो सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं लगेगा. अपनी सघन यात्राओं के दौरान रिकॉर्ड बेचने की पुरानी दुकानों की खाक छानने और अपने पिता के संग्रह को सीने से लगाए घूमने का जुनून अब लगता है कि निरर्थक नहीं रहा. याद करूं तो हर गाने और हर कैसेट के पीछे एक मुख्तसर कहानी जुडी हुई है जो अब मेरे लिये एक दुर्लभ ऐतिहासिक महत्व की चीज़ है.
तो ख़ैर ... कल के दिल ने फिर याद किया शो में मैंने तक़दीर(1943), तानसेन(1943), सिंगार(1949),पगली(1950),ज़ीनत(1945),पुनर्मिलन(1940),शुक्रिया (1944), पृथ्वीवल्लभ(1943), विद्यापति(1937)और मुक़ाबला(1942) के कुछ गाने सुनाते हुए इन फिल्मों से जुडे कुछ नामों और फिल्मों का ज़िक्र किया तो सुनने वालों के फोन इस बात को रेखांकित करते रहे कि इन गानों से वो 60-65 साल पीछे छूट गये अपने बचपन और जवानी के दिनों में पहुँच गये. मेरठ के एक श्रोता संपूरण सिंह का कहना था कि पेशावर में उनकी क्लास का एक लडका बहुत चंचल था और दो पीरियड्स के बीच वो अक्सर बंसरी(1943) का यह गाना ज़ोर-ज़ोर से गाया पाया जाता था और लडके बडे मज़े से उसे सुनते थे. हाजी नूर मोहम्मद चार्ली उस ज़माने के बडे नामची न कॉमेडियन थे और साइलेंट इरा से लेकर बोलती-गाती फिल्मों के शुरुआती दौर तक फिल्मों में अपनी कॉमेडी के जौहर दिखाते रहे. वो अपने गाने खुद लिखते थे, खुद ऐक़्टिंग करते हुए उन्हें गाते थे और कई बार इन गानों को ख़ुद कंपोज़ भी करते थे. आप भी सुनिये बंसरी का वह गाना जिसे सुन कर संपूरण सिंह अपने पेशावर के दिनों की यादों में खो गये. क्या आपको किशोर कुमार की याद आई? आया करो इधर भी मेरी जाँ कभऊ-कभऊ...
सात अक्टूबर को आलोक पुराणिक ने नीचे छपी पोस्ट जारी की थी. इसे देखकर मैंने वादा किया था कि जल्द ही मैं मुश्ताक़ साहब की किसी रचना का पॉडकास्ट यहां पेश करूंगा. तो लीजिये ज़िया मोहिउद्दीन की आवाज़ में सुनिये मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की एक व्यंग्य रचना.
ज़िया मोहिउद्दीन
Dur. 7Min 44Sec
संडे शेयरिंग-सरे शाम कलाकंद यानी मुश्ताक अहमद यूसुफी का हुनर -आलोक पुराणिक हिंदी में हास्य-व्यंग्य पढ़ने वालों के यह नाम-मुश्ताक अहमद यूसुफी –बहुत जाना-पहचाना नहीं है। पर रचनाकार की पहचान उसका काम होता है, यूसुफी साहब के कुछ किस्सों, उपन्यासों को अभी एक किताब की शक्ल में लफ्ज प्रकाशन नोएडा ने छापी है-खोया पानी- नाम से। यूसुफी साहब पाकिस्तान में बहुत बड़े बैंकर रहे हैं। तरह-तरह के बैंकों के चेयरमैन टाइप पोस्टों पर रहे हैं। बहुत बड़े अफसर रहे हैं, इसके बावजूद भी बहुत समझदारी की बहुत बातें करते हैं। उन्हे पाकिस्तान में सितारा-ए-इम्तियाज, और हिलाल-ए-इम्तियाज अवार्ड मिले हैं, जो जानकारों के मुताबिक, भारतीय संदर्भों में साहित्य एकेंडमी अवार्ड और ज्ञानपीठ अवार्ड के समकक्ष हैं। मेरे जैसे नये व्यंग्यकार को यूसुफी साहब के कदमों में बैठकर बहुत कुछ सीखना है, सीधी मुलाकात तो क्या ही होगी। उनकी किताब बहुत कुछ सिखाती है, अंदाये बयां क्या होता है। कैसे लिखा जाता है, ये सब सीखना हो, तो यह किताब एक टेक्स्ट बुक है। मैं क्या बोलूं, चंद लाइनें किताब की पेश कर रहा हूं, आप खुद ही देखें-
-विदेश घूमने और देश से दूर रहने का एक लाभ ये देखा कि देश और देशवासियों से प्यार न केवल बढ़ जाता है, बल्कि अहैतुक हो जाता है- -पाकिस्तान की अफवाहों में सबसे बड़ी खऱाबी ये है कि सच निकलती हैं। -यूं लंदन बहुत दिलचस्प जगह है और इसके अलावा इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती कि गलत जगह पर स्थित है। -इसे बदनसीबी ही कहना चाहिये कि जिन बड़े और कामयाब लोगों को निकट से देखने का अवसर मिला, उन्हे मनुष्य के रुप में बिल्कुल अधूरा और हल्का पाया। -अकेला चना भाड़ तो क्या खुद को भी नहीं फोड़ सकता। -लोग अर्से तक अलीगढ़ को भी गांव समझते रहे, जब तक कि वहां फिल्म नहीं आयी और कार के एक्सीडेंट में पहला आदमी नहीं मरा। -फरमाया कि शायरों से यतीमखाने और स्कूल के चंदे के लिये अपील जरुर कीजियेगा। उन्हे शेर सुनाने में जरा भी शर्म नही आती, तो आपको इस पुण्यकार्य में काहे की शर्म। -हमारा ख्याल है कि इक्के का आविष्कार किसी घोड़े ने किया होगा, इसीलिये इसके डिजाइन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि घोड़े से अधिक सवारी को परेशानी उठानी पड़े। -आमिल कालोनी में दस्तगीर साहब ने मादा कुत्ता पाल लिया है। किसी शुभचिंतक ने उन्हे सलाह दी थी कि जिस घर में कुत्ते हों, वहां फरिश्ते, कुत्ते और चोर नहीं आते। उस जालिम ने यह नहीं बताया कि फिर सिर्फ कुत्ते ही आते हैं। अब सारे शहर के बालिग कुत्ते उनकी कोठी का घेराव करे पड़े रहते हैं। शहजादी स्वयं शत्रु से मिली हुई है। -इधऱ बिशारत अपने विचारों में खो गये। इस एक आरपार झुग्गी में, जिसमें न कमरें हैं ,न पर्दे, न दीवारें, न दरवाजे, जिसमें आवाज, टीस और सोच तक नंगी है, जहां लोग शायद एक दूसरे का सपना भी देख सकते हैं। यहां एक कोने में बूढ़ा बाप दम तोड़ रहा है, दूसरे कोने में बच्चा पैदा हो रहा है और बीच में बेटियां जवान हो रही हैं। भाई मेरे, जहां इतनी रिश्वत ली थी, वहां थोड़ी सी और लेकर पत्नी को अस्पताल में दाखिल कर देते तो क्या हरज था। -वस्तुत रास्ते नहीं बदलते इंसान बदल जाता है। सड़क कहीं नहीं जाती वो तो वहीं की वहीं रहती है मुसाफिर खुद कहां से कहां पहुंच जाता है। राह कभी गुम नहीं होती राह चलने वाले गुम हो जाते हैं। -आपकी गरीबी अमेरिका और अरब देशों की देन है। हमारी गरीबी अपनी गरीबी है। -गाली, गिनती और गंदा लतीफा तो अपनी मादरीजबान में ही मजा देता है। -मैंने खुद अपनी आंखों और कानों से एक मुशायरे में हजरत अली सरदार जाफरी को दस-बारह बहुत लम्बी नज्में सुनाने के बाद हाथ जोड़कर स्टेज से उतरते देखा। खैर ऐसी वारदात के बाद तो हाथ जोड़ने का कारण हमारी समझ में भी आता है। -और साहब मूलगंज को देखकर तो कलेजा मुंह को आ गया। ……………….मैंने देखा कि अब तवायफों ने गृहस्थिनों के से शरीफाना लिबास और ढंग अपना लिये हैं। अब उन्हे कौन समझाये कि इसी चीज से तो घबरा कर दुखियारे तुम्हारे पास आते थे। -मैनेजर को आगाह किया कि तुमने जिस शख्स को लैला का बाप बनाया है उसकी उम्र मजनूं से भी कम है। नकली दाढ़ी की आड़ में वो लैला को जिस नजर से देखा करता है उसे बाप का प्यार हरगिज नहीं कहा जा सकता। -मां से कहा-बेगम, हम आज लुट गये। आज घर में चूल्हा नहीं जलेगा। सरे शाम ही कलाकंद खा कर सो गये। -पाकिस्तान में जो लड़के पढ़ाई में फिसड्डी होते हैं, वो फौज में चले जाते हैं और जो फौज के लिए मेडिकली अनफिट होते हैं, वो कालिजों में प्रोफेसर बन जाते हैं।
ऐसी धारदार लाइनें इस किताब में सैकड़ों हैं।
किताब-खोया पानी लेखक-मुश्ताक अहमद यूसुफी उर्दू से हिंदी में अनुवाद-तुफैल चतुर्वेदी प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्गसेक्टर 11, नोएडा-201301 मोबाइल-09810387857 कीमत-200 रुपये हार्डबाऊंड पेज -350 -------------------------------------
7 Responses to “संडे शेयरिंग-सरे शाम कलाकंद यानी मुश्ताक अहमद यूसुफी का हुनर”
यूसुफ़ी साहब की कई रचनाएं ज़िया मोहिद्दीन अपनी प्रस्तुतियों में शामिल करते हैं. कभी मौक़ा मिला तो टूटी हुई… पर उनमें से कोई रचना पेश करूंगा. हिंदी में ये प्रयोग अभी शुरू भी नहीं हुए हैं जबकि पाकिस्तान में इनका चलन एक ज़माने से है.
“लोग अर्से तक अलीगढ़ को भी गांव समझते रहे, जब तक कि वहां फिल्म नहीं आयी और कार के एक्सीडेंट में पहला आदमी नहीं मरा।”
“गाली, गिनती और गंदा लतीफा तो अपनी मादरीजबान में ही मजा देता है।”
“मैंने खुद अपनी आंखों और कानों से एक मुशायरे में हजरत अली सरदार जाफरी को दस-बारह बहुत लम्बी नज्में सुनाने के बाद हाथ जोड़कर स्टेज से उतरते देखा। खैर ऐसी वारदात के बाद तो हाथ जोड़ने का कारण हमारी समझ में भी आता है।”
आलोक भाई मैं तो किताब मुफ्त में ही पढ़ूँगा हो सके तो प्रबंध करें या युसूफी साहब को कहें कि हमसे बात करें… सब कुछ बड़ा ही जीवंत है…। आशीष दें….ज्ञान दें…
वाह वाह जी है ये तो,
कुछ और हम भी शेयर कर लेंगे जी.
मुश्ताक अहमद यूसुफी तो बड़े रोचक सज्जन प्रतीत होते हैं. आपने उनके बारे में बता कर बड़ा भला काम किया है.
आप ऐसा भला काम हर सण्डे किया करेंगे?
क्या धांसू बाते बताई हैं जनाब ने। ये किताब तो खरीदने लायक है। आपका भी शुक्रिया कि आपने इनके बारे में बताया।
यूसुफ़ी साहब की कई रचनाएं ज़िया मोहिद्दीन अपनी प्रस्तुतियों में शामिल करते हैं. कभी मौक़ा मिला तो टूटी हुई… पर उनमें से कोई रचना पेश करूंगा. हिंदी में ये प्रयोग अभी शुरू भी नहीं हुए हैं जबकि पाकिस्तान में इनका चलन एक ज़माने से है.
“लोग अर्से तक अलीगढ़ को भी गांव समझते रहे, जब तक कि वहां फिल्म नहीं आयी और कार के एक्सीडेंट में पहला आदमी नहीं मरा।”
“गाली, गिनती और गंदा लतीफा तो अपनी मादरीजबान में ही मजा देता है।”
“मैंने खुद अपनी आंखों और कानों से एक मुशायरे में हजरत अली सरदार जाफरी को दस-बारह बहुत लम्बी नज्में सुनाने के बाद हाथ जोड़कर स्टेज से उतरते देखा। खैर ऐसी वारदात के बाद तो हाथ जोड़ने का कारण हमारी समझ में भी आता है।”
जबर्दस्त.
आलोक भाई
मैं तो किताब मुफ्त में ही पढ़ूँगा
हो सके तो प्रबंध करें या युसूफी साहब को कहें कि हमसे बात करें…
सब कुछ बड़ा ही जीवंत है…।
आशीष दें….ज्ञान दें…
आलोक जी ये किताब हम भी पढ़ना चाहेंगे। ऐसा ज्ञान हम सब से बाटँने के लिए शुक्रिया