दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Wednesday, July 23, 2008

यूट्यूब पर मेरा पहला वीडियो

आज सोचा की यूट्यूब के ज़रिये आप तक एक गीत पहुँचाऊँ। तो लीजिये मधुबाला की फ़िल्म से ये मजेदार गीत । फ़िल्म का नाम नहीं मालूम।



ये आवाज़ें किसकी हैं !


अमीर ख़ुसरो की यह रचना आपके साथ शेयर करने का मक़सद महज़ ये जानना है कि इस गीत में आवाज़ें किसकी हैं!



अच्छे बन्ने मेहँदी लावन दे रे...

Monday, July 21, 2008

असीमुन बीबी: आवाज़ की जादूगरनी


गाँव-गाँव तक गाने-बजानेवाले मौजूद हैं. जितना ज़्यादा अपनी धरती और अपने लोगों के बारे में जान पाता हूँ, मन में उतनी ही ज़्यादा सहानुभूति और करुणा उन गायकों के लिये उभरती है जो बाज़ार में आकर खडे हो गये लेकिन समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें. मुज़फ़्फ़र अली, ज़िला ख़ान, कैलाश खेर, शुभा मुद्गल और कभी-कभी आबिदा परवीन भी जिस चमत्कार की नाकाम कोशिश करती हैं वो हिंदुस्तान की मिट्टी में खोया हुआ है.
कोई बीस साल पहले अपनी इसी खोजबीन में मुझे असीमुन बीबी हाथ लगी थीं जो उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ के किसी छोटे से गाँव में अपनी दो अन्य सहयोगी गायिकाओं के साथ उन दिनों घर-घर जाकर काज-परोजन में गाया करती थीं. बताया जाता है कि अवध की किसी रियासत से उनके तार जुडे हुए थे जहाँ वे महफ़िलों में गानेवाली ट्रेंड गायिका थीं. सादे से छोटे ढोलक और उतने ही छोटे अजीब दिखने वाले हारमोनियम गले में लटकाए वो पहुँच जाया करती थीं और आल्थी-पाल्थी मारकर गाने में जुट जाती थीं. वो घर के सदस्यों की तरह ही सम्मान और अपनेपन की हक़दार थीं. उनके कपडे और साज़ सभी हल्दी और लहसुन की ख़ुशबुओं से सने होते और उनकी आवाज़ में शास्त्रीयता और लोक की जटिल मिलावट पाई जाती. आपको सुनाता हूँ असीमुन बीबी के गाए दो छोटे टुकडे-

अरब में लाला हुए हैं...


सनन-नन-नन-नन-नन...


फ़ोटो: साभार रेशियोजूरिस

Tuesday, July 15, 2008

आइये आज मिलते हैं राजीव सक्सेना से!

आप अगर एफ़एम सुनते हैं तो राजीव सक्सेना का नाम आपके लिये बेहद जाना पहचाना नाम है. पुरानी दिल्ली के बाज़ार सीताराम में जन्मे राजीव आजकल एफ़एम गोल्ड पर प्रोग्राम करते हैं.वे क्रिकेट कमेंटरी, रेडियो स्पॉट्स, गणतंत्र दिवस के सीधे हाल-हवाल औए कई विशेष कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग करते हुए आपको सुनाई देते हैं. आइए सुनते हैं कि यह बोलती हुई आवाज़ क्या महज़ बोलने में यक़ीन रखती है, या सोचकर बोलती है! 1978 में आकाशवाणी पर युववाणी से शुरुआत करने वाले राजीव सक्सेना आज रेडियो के लोकप्रिय प्रेज़ेंटर हैं. एक ज़माने के धुरंधर ब्रॉडकास्टरों- देवकीनंदन पांडे, मेल्विल डी मेलो, जयनारायण शर्मा, मिस मेहरा , सीतांशु भादुडी, पुष्पा नटराजन,देवेंद्र सक्सेना, विपिन मित्तल और गुलशन मधुर का दौर देख चुके राजीव के साथ काम करना मेरे लिये सौभाग्य की बात है क्योंकि इस तरह आप नये और पुराने का सामंजस्य करना सीखते हैं. तो आइये शुरू करते हैं राजीव सक्सेना के पेश किये हुए एक कार्यक्रम की एक झलक से. यह विशेष कार्यक्रम विजयदीपक छिब्बर के साथ काम करते हुए राजीव ने अशोक कुमार की मृत्यु के तुरंत बाद एफ़एम गोल्ड पर पेश किया था. इसे तब विग्यान भवन में हुई एक श्रद्धांजलि सभा में भी सुनाया गया था. ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना... XXXXXXXXXX राजीव सक्सेना से बातचीत पार्ट-1 (approx 30 min) राजीव सक्सेना से बातचीत पार्ट-2(अंत तक) (approx 30 min)

Monday, June 30, 2008

छिब्बरजी अब बंबई में हैं!


विजय दीपक छिब्बर के साथ अभी पिछले हफ़्ते कोई सात बरसों से चला आ रहा लगभग रोज़ का सिलसिला टूट गया। वो अब ट्राँसफ़र होकर बंबई पहुँचे हैं और विविध भारती के साथ बतौर प्रोग्राम एग्ज़ीक्यूटिव काम करेंगे. इस तरह अब शायद हमारे आपके साथी ब्लॉगर यूनुस उनकी आगे की ख़बर हम तक पहुँचाएंगे. नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से प्रशिक्षित विजय दीपक छिब्बर फिल्मों-नाटकों और टीवी धारावाहिकों में काम करते हुए आख़िरकार जिस एक पायनियरिंग भूमिका के लिये याद किये जाएँगे, वो है नए एफ़एम रेडियो में प्रोग्रामिंग का सूत्रपात. उनके एक और सहयोगी दानिश इक़बाल इस काम में बराबर के हिस्सेदार हैं और इस तरह ये दो मूरतें तब तक जय और बीरू की तरह दिखती रहीं जब तक एफएम प्रसारण का नया मुहावरा गढ नहीं लिया गया. उसी नींव पर आज एफ़एम फल-फूल रहा है, ये अलग बात है कि प्रोग्रामिंग को बाज़ार ग़ैर-ज़रूरी मानता है.

कोई तीन साल पहले मैंने एक रिसर्च के सिलसिले में छिब्बरजी से एक लंबा इंटरव्यू किया था जिसे आज तक आपसे शेयर नहीं कर सका हूँ. कुछ तो शायद इसलिये कि इसे चापलूसी के ख़ाने में न रख दिया जाय और दूसरा इसलिये कि ब्लॉग और उसके ज़रिये शेयरिंग का मंच भी हाल ही की घटना है.
मैंने छिब्बरजी (यही हम उन्हें कहते आए हैं) के साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखा है और आगे भी ऐसे मौक़े हासिल करना चाहूँगा. ऐसा नहीं है कि उनसे हर बात पर सहमति ही रही हो, कई मौक़ों पर हम तीखी-बहसों में भी उलझे, जिनका मक़सद कभी प्रोग्राम तो कभी अपनी सोच में क्लैरिटी लाना रहा है.पिछले पुस्तक मेले में अशोक पांडे द्वारा अनूदित वैन गॉ की आत्मकथा से वो बडे प्रभावित हुए(अशोक ने अपनी मुलाक़ात के दौरान ये किताब उन्हें भेंट की थी) और अशोक तक अपनी बधाई भेजने को कहा, जो बधाई मैं इस पोस्ट के ज़रिये अशोक तक पहुँचाता हूँ. मुझे आज यह सोचते हुए अच्छा लगता है कि जब एफएम का दूसरा चैनेल देश में शुरू हुआ तो कई नये प्रोग्राम्स की सोच को अमली जामा पहनाने की ज़िम्मेदारी मुझे दी गई. मैं इस पोस्ट के ज़रिये छिब्बर जी की शख़्सियत और उनके निजी अनुभवों को सामने लाने के अलावा उनके उस विश्वास के प्रति सम्मान ज़ाहिर करना चाहता हूँ जो उन्होंने मुझ पर किया।




Part-1 12min


Part-2 7min


Part-3 18min


Part-4 7min


Part-5 4min


Part-6(Last) 27min