दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Saturday, January 18, 2014

झाड़ियां -2

परवाह नहीं
कि कोई हंसेगा
जो मैंने ये कहा कि
झाड़ियां मेरे लिए आत्मीय हैं
और जंगल  का स्मरण
 झाड़ियों ही को सबसे पहले
मेरे नज़दीक सरका देता है

पगडंडियों से गुज़रते हुए
की बार मैंने सांस लेते
सूना है इन कम्बल में दुबके
लोगों को

इनसे बातें भी की हैं

और जब कभी पगडंडियों
पर बहुत जल्दी होती है
और दौड़ने की कोशिश करता हूं
तो क़मीज़ का दामन
फांस लेती हैं  झाड़ियां
एक दिन जब मैंने
जल्दी में दामन छुड़ाने के लिये हाथ बढाया
तो एक कांटा
लहूलुहान कर गया.

(ट्रेन, पटना से कानपुर २८ फ़रवरी 1991)

झाडियां-1

और झाडियों के बारे में
इतना तो कह ही
सकता हूं कि
वे कम्बलों में दुबके लोग
ही हैं जो
झंडे की बंदरबांट में शामिल नहीं थे
उस रात जब
रेलों में लोग ढूंढ ढूंढ कर मारे गये,
ये अपने कंबलों में दुबक गये.

पेड़ों को तो ख़ैर तुम
आज भी नर्तन
की मुद्रा में देखते होगे
संसदों और सट्टाबाज़ारों में दो को चार बनाते.

(ट्रेन, पटना से कानपुर, 28 फ़रवरी 1991)

प्राथमिकताएं बदलो

ख़ुशियों और चिडियों की
बड़ी गड्डमड्ड होती छवियां हैं
मेरे मन में

वो जो कुछ मर रहा है
मेरे भीतर
ऑर्केस्ट्रा में सिंथेसाइज़र बजाते छोकरे की
जड़ छायाएं हैं
यहां चिडियों के परों को झुलसा देने वाली

घर रहने आई हैं चिडियां

उन्हें संगीत और हथेलियों के शोर से
बचाना है.

(पटना, दिसंबर 1991)

सड़क बनाने वाले

रोलर-आग
बजरी और कोलतार...

लो आ गये सड़क बनाने वाले !
बड़े बड़े वाहनों और आने जाने वालों की गालियों
से बचते हुए
लगे रहते हैं दिन रात

अक्सर सुबह जब हम जगते हैं
तो पाते हैं, सड़कें- चिकनी- काली-मज़बूत
बिछी हैं.
हल्की टूट-फूट पर भी लग जाते हैं
सड़क बनानेवाले

सड़क बनानेवाले
अपनी ज़िंदगी की टूट-फूट से बेखबर
हमारी सड़कें बनाते रहते हैं.

(गुरमा, 18 अप्रेल, 1988)

नींव के प्रति

तुम उनके बारे में
जानते हो?
जो तुम्हारे बारे में जानते हैं

सुनसान काली रातों में
जाग जाग कर
रास्ते तलाश करते हैं

सुनहरी चटख़ धूप में
सूरज को सिर पर लिये
बांट-बांट लेना चाहते हैं

ठिठुरती सुबह
जो निकल पड़ते हैं
बंद किताबों के वर्क़ पलटने

जिनकी आंखों में से झांकती हैं
कई कई आंखें एक साथ
जिनके हाथों में कई-कई हाथों की
ताक़त समा गयी है
जिनके दिलों में कई गुनाह उत्साह है

जिनके लिये तुम्हे विचारवान बनाना
तुम्हे दिन को दिन कहने की हिम्मत बख्शना
रेत के महल बनाने जैसा नहीं लगता

तुम उनके बारे में जानते हो
जो तुम्हारे बारे में
जानते हैं?

जैसे कपड़ों को दर्ज़ी, बालों को नाई
मिट्टी को कुम्हार
या
नदी को किनारे
और भूखे को रोटी की
ज़रूरत है
वैसे ही फ़िलहाल

तुम्हें इनकी ज़रूरत है

तुम्हारे पास तुम्हारे लिये वक़्त नहीं है
तो क्या?
तुम्हें काली आंधियों से
बचाने के लिये
ये व्यूह रचना कर रहे हैं

तुम उनके बारो में जानो
जो तुम्हारे बारे में
जान रहे हैं.

(गुरमा, 11 अप्रेल 1988)