दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Saturday, January 18, 2014

शीर्षकहीन

मैंने सोचा था कि
एक दिन अच्छा बांसुरीवादक हो जाऊंगा
मैंने आईने में देखा
मेरी टोपी टेढी थी
और जूते का तलवा फट गया था/

'बांसुरी बजाने और टोपी के टेढे होने
बांसुरी बजाने और जूते का तलवा फटा होने में
कोई रिश्ता नहीं होता'
मैंने सोचा

फिर मैं ने चाहा कि सुरों के सहारे
वहां वहां पहुंच जाऊं जहां पहुंचने के सपने
मैं लड़कपन में देखा करता था

मैं ने किताबों के वर्क़ पलट डाले
और उजास घरों की तलाश में जुट गया

'बुद्धिनाथ भाई ! ज़रा नीचे आइये'

साथ थे सिगरेटों के पैकेट्स
कच्ची नींदों में जवान लड़कियों के सपने
और सांठ -गांठ से जीवन चलाने के जोड़ गुणा
रात जैसे बहसों में बीते घंटों की तरह काली
'साले तू भी कैसे कैसे सवाल उछाल देता है? देखता नहीं कि
आखिरी अंडरवियर भी अब साथ छोड़ चला है

बीवी थी/ बेचारी क्या करती?
उसकी भी ज़िंदगी तो कैरम की गोट जैसी रही
उसे कभी नहीं दे पाया पांच शेर शक्कर कि ले
हम सब की ज़िंदगी मीठी बना डाल

शहर में एक गाड़ी थी
छोटे छोटे झुनझुने बंधे थे उसमें
हुक्म था कि गाड़ी चले तो झुनझुने बजने चाहिये
धीरे धीरे नहीं / ज़ोर से कि बच्चे की रोती आवाज़ न सुनाई दे पाये
बस टुन-टुन-टुन-टुन

एक एक कर सारे दोस्त घंटियां बनने चले गये

चारों तरफ़ धुआं था और कमरा बंद था
नौकर कहता था- शाप आजकल आप शिग्रेट बहोत पीने लगे हो

नींद या तो आती नहीं थी या आती तो किसी मैदान के
बीचो बीच मैं अपने को बैठा हुआ पाता

दूर-दूर कुछ बड़े स्तनों वाली - झूलते नितंबों वाली
तथाकथित सुंदर लड़कियां पत्थर के छोटे छोटे टुकड़े मारकर
मेरी नींद का कच्चा घड़ा फोड़ देतीं

मुझे लगा कि बच्चे पैदा करने की एक सीमा होती है
जब मुझे लगा कि झूठ बोलने की भी एक सीमा होनी चाहिये

वरना यह डर लगातार मौजूद है कि आपके जननांगों में
फफूंदी लग जायेगी और
चेहरों पर अविश्वास की घास उग आयेगी

मैंने नौकर से कहा है कि वह हर घंटे मेरे कमरे से
सिगरेट के टोटे निकाल फेंका करे
वरना ये धुआं ही क्या कम है
जो ये टोटे भी हलक़ में फंसने को मेरा खौफ़ कई गुना करते हैं
(अधूरी, इलाहाबाद, 1 मई,1988)

नोट्स

कि बहुत दिन हो गये सांप को देखे
और अचानक गिर पड़े भी बहुत दिन हुए

07 दिसम्बर 1990

Monday, January 13, 2014

तैयारी

यह हमारे लिये चुनौती है
इतिहास के पन्नों में दर्ज किसी भी
चुनौती को मुंह चिढाती

ये यूनीपोलर गुंडे का बढा हुआ लालच है जिसे
पाने की चाह में उछल रहे हैं
हमारे भाग्य विधाता
यह हमारे विकास के लिये ज़रूरी थैली है
अखबार हमें बताते हैं

गलियों में धूल उड़ाते इम्पोर्टेड सामानों से
लदे ट्रक अब आम हो रहे हैं

और कल तक नैतिकता की दुहाई देनेवाले
बड़ी ललचाई नज़रों से इस
लालची बूढे को देख रहे हैं

हम जो तेज़ रफ़्तार गाडियों की चपेट में आने से बच पाए
एक दूसरे का हाथ थामें सड़कें पार कर रहे हैं
सहमे चूहों जैसे हमारे नन्हें चेहरे कोई भी देखना नहीं चाहता
लेकिन युद्ध की इस चुनौती को हमने अपने तकियों के नीचे
सुना है

इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हैं ऐसी चुनौतियां
और हमें किसी योद्धा से मदद भी नहीं चाहिये
हमारे पहाड़ हैं और सूर्य हमारे नथुनों में करोड़ों वर्षों की
सुगन्धियां भर रहा है
पर्वतों को हमने पुतलियों पर सजाया है
और समुद्र हमारे छोटे सीनों पर गरज कर हमें
वाष्पित करता है
हमने समुद्र को मल लिया है अपने चेहरे पर
और चले आये हैं
इस चुनौती से लोहा लेने.

II इरफ़ान, मद्रास, सितम्बर, 1992 II

नया साल

नये साल, न आना हमारे घर हम एक प्रेतलोक की प्रतिध्वनियां हैं छोड़ दिया है हमें लोगों ने हमें रात और अतीत निकल चुके हैं हमारे हाथों से नियति ने भुला दिया है हमें कोई प्रतीक्षा नहीं, न कोई उम्मीद हमारे पास न कोई स्मृति है, न कोई सपना. हमारे शांत चेहरे खो चुके हैं अपना रंग अपनी दमक. नाज़िक अल-मलैका अरबी कवयित्री, बग़दाद (शेष कुछ और अंश) ... नये साल चलते रहो कोई गुंजाइश नहीं है हमारे जागने की सरकंडे की बनी हैं हमारी नसें क्रोध ने छोड़ दिया है बहना हमारे खून में.

Monday, August 19, 2013