दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Saturday, January 18, 2014

नोट्स

कि बहुत दिन हो गये सांप को देखे
और अचानक गिर पड़े भी बहुत दिन हुए

07 दिसम्बर 1990

Monday, January 13, 2014

तैयारी

यह हमारे लिये चुनौती है
इतिहास के पन्नों में दर्ज किसी भी
चुनौती को मुंह चिढाती

ये यूनीपोलर गुंडे का बढा हुआ लालच है जिसे
पाने की चाह में उछल रहे हैं
हमारे भाग्य विधाता
यह हमारे विकास के लिये ज़रूरी थैली है
अखबार हमें बताते हैं

गलियों में धूल उड़ाते इम्पोर्टेड सामानों से
लदे ट्रक अब आम हो रहे हैं

और कल तक नैतिकता की दुहाई देनेवाले
बड़ी ललचाई नज़रों से इस
लालची बूढे को देख रहे हैं

हम जो तेज़ रफ़्तार गाडियों की चपेट में आने से बच पाए
एक दूसरे का हाथ थामें सड़कें पार कर रहे हैं
सहमे चूहों जैसे हमारे नन्हें चेहरे कोई भी देखना नहीं चाहता
लेकिन युद्ध की इस चुनौती को हमने अपने तकियों के नीचे
सुना है

इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हैं ऐसी चुनौतियां
और हमें किसी योद्धा से मदद भी नहीं चाहिये
हमारे पहाड़ हैं और सूर्य हमारे नथुनों में करोड़ों वर्षों की
सुगन्धियां भर रहा है
पर्वतों को हमने पुतलियों पर सजाया है
और समुद्र हमारे छोटे सीनों पर गरज कर हमें
वाष्पित करता है
हमने समुद्र को मल लिया है अपने चेहरे पर
और चले आये हैं
इस चुनौती से लोहा लेने.

II इरफ़ान, मद्रास, सितम्बर, 1992 II

नया साल

नये साल, न आना हमारे घर हम एक प्रेतलोक की प्रतिध्वनियां हैं छोड़ दिया है हमें लोगों ने हमें रात और अतीत निकल चुके हैं हमारे हाथों से नियति ने भुला दिया है हमें कोई प्रतीक्षा नहीं, न कोई उम्मीद हमारे पास न कोई स्मृति है, न कोई सपना. हमारे शांत चेहरे खो चुके हैं अपना रंग अपनी दमक. नाज़िक अल-मलैका अरबी कवयित्री, बग़दाद (शेष कुछ और अंश) ... नये साल चलते रहो कोई गुंजाइश नहीं है हमारे जागने की सरकंडे की बनी हैं हमारी नसें क्रोध ने छोड़ दिया है बहना हमारे खून में.

Monday, August 19, 2013