दुनिया एक संसार है, और जब तक दुख है तब तक तकलीफ़ है।

Thursday, June 19, 2008

कृपया मदद करें

मित्रो!
मैं एक कहानी की तलाश में हूँ। स्वयं प्रकाश की यह कहानी "क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है?"
मेरे पास बरसों से है लेकिन जब ढूँढ रहा हूँ तो हाथ नहीं आ रही. आप में से अगर किसी के पास यह कहानी है तो कृपया ramrotiaaloo@gmail.com पर भेज दें। भेजने वाले को एक सरप्राइज़ अनुभव दिया जाएगा.
धन्यवाद

Tuesday, June 17, 2008

एक छात्र नेता, जो कि बाद में उत्तर प्रदेश में मंत्री बना, के मंत्रीत्व काल के भाषण से एक अंश


आदरणीय द्विवेदीजी, तिवारीजी, झाजी और परमादरणीय चौबेजी,

आज बहुत बडा कोस्चन खडा हो जाता है कि हमारे बीच आदर्स नहीं हैं. अतीत में हमारे आदर्स और उद्देस्य ससक्त थे. आदर्स थे बाबा-ए-कौम महात्मा गाँधी और उद्देस्य था देस की आजादी. गाँव से लगायत और दिल्ली की पंचायत तक. बहुत कम लोग होते हैं जिनके मन में दर्द,पीडा और बेदना होती है. मैं बनारस की धरती से आने का काम करता हूँ. गाँव में बडा अभाव है, अभाव दुनिया की सबसे खराब चीज है वह आदमी का स्वभाव बदल देता है. एक लाख से अधिक लोग आज सडक पर मरने का काम करते हैं. हमें सडक पर चलने की तमीज नहीं है.इसलिये यह जो सडक सुरक्षा सप्ताह मनाने का काम किया गया है, मैं तन, मन और धन से इसका समर्थन करता हूँ. धन्यवाद.

Wednesday, June 11, 2008

बीकानेर का एक संस्मरण

"अलाउद्दीन ख़िलजी मुसलमान था, परंतु दयालु था." बाक़ी सब तो ठीक लेकिन इस परंतु पर ग़ौर कीजिये. यह आठवीं कक्षा के इतिहास के पाठ्यक्रम में पढाया जा रहा है.

एक बार मैं ट्रेन में सफ़र कर रहा था. सुबह जब आँख खुली और साथी मुसाफ़िर दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर थोडे अनौपचारिक होने लगे तो मेरे एक साथी मुसाफ़िर ने मुझसे पूछा "आपका नाम?" मैंने जवाब दिया "मुशीरुल हसन" वो छूटते ही बोला "कोई शेर सुनाइये!"
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती वर्ष में एक व्याख्यान के दौरान प्रख्यात इतिहासकार और विचारक प्रोफेसर मुशीरुल हसन ने ये दो दृष्टांत सुनाए थे.
------------------------
ये वाक़या कोई आठ साल पुराना है जब मुझे बीकानेर की आर्मी लायज़ाँ यूनिट ने पूछताछ के लिये बैठा लिया था. आपका नाम आपको किस तरह के नफ़े-नुक़सान पहुँचाता है इसका लेखाजोखा रखने के लिये शोध संस्थानों को पृथक शोध-अध्ययन केंद्र चलाने चाहिये."शक के रेगिस्तान में" शीर्षक से इस वाक़ये को मैं जनसत्ता (26 नवंबर 2000)में लिख चुका हूँ.

अलीगढ के नाट्यकर्मी राजेश कुमार का पिछले हफ़्ते फ़ोन आया कि वह कतरन अगर मेरे पास हो तो मैं उन्हें भेज दूँ, वो शायद इस संदर्भ में कोई नाटक लिख रहे हैं. ख़ैर इस कतरन को उन्हें भेजा तो याद आया कि आपमें से जिनकी नज़र इस संस्मरण पर न पडी हो उनसे भी यह अनुभव साझा करूँ. तो पेश है. इमेज पर डबल क्लिक करने से वह पढने लायक़ हो जाएगी.

Tuesday, May 27, 2008

सुनिये कुबेर दत्त की दो कविताएं


दूरदर्शन के कुछ चुनिंदा प्रोड्यूसरों में अपनी मौलिक सूझबूझ, लेखन और गंभीर आवाज़ की वजह से कुबेर दत्त अलग से पहचाने जाते हैं. टेलीविज़न पर कई कार्यक्रमों की देसी आवश्यकताओं के अनुरूप प्रस्तुति ने उन्हें लोकप्रियता की ऊँचाइयों पर रखा है. आप और हम, जन अदालत, पत्रिका, फलक और कई विशेष आयोजनों में उन्होंने समय और उसके प्रश्नों को हमेशा ध्यान में रखा. कवि, कथाकार, पटकथा लेखक, फ़िल्मकार और अब चित्रकार कुबेर दत्त इन दिनों दूरदर्शन के मंडी हाउस में चीफ़ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. पेश है कोई आठ साल पहले उनके घर पर रिकॉर्ड की हुई उनकी दो कविताएं "एशिया के नाम" और "समय जुलाहा" उनके ही स्वर में.

एशिया के नाम समय जुलाहा

Wednesday, May 21, 2008

रेडियो रेड और क़िस्सागोई: सुनिये सियारामशरण गुप्त की एक क्लासिकल कहानी


हमारा साहित्य कई कालजयी रचनाओं से भरा पडा है. मानवता की करुण दास्तानें और उनकी निर्दोष अभिव्यक्तियों की बानगियाँ चप्पे-चप्पे पर दर्ज हैं. रेडियो रेड समय-समय पर इन्हीं रचनाओं का महत्व और उत्सव रेखांकित करता रहता है. इसी क्रम में आज पेश है सियारामशरण गुप्त की शॉर्ट स्टोरी काकी. आवाज़ है हमारी सहकर्मी राखी की.


अवधि: लगभग 5 मिनट