
लिखो एक ऐसा शब्द जिससे गाली की बू आती हो. यही सोच-सोचकर रातें काली करता है और अपनी ही बनाई नाली में लोटता-पोटता है और कहता है-
उधर चिलांडुओं को देखकर गले में उँगली डालता है कहाँ है उल्टी की बास जिसे बाहर निकाला जा सकता है. हज़ार धतकरम करता है और निराश हो जाता है. उनके पास तो ऐसी-ऐसी बातें हैं और मेरे पास बस ऐसी और ऐसी. मैं हूँ और बस मैं...मैं और मेरी भडास...अक्सर आपस में ये बातें करते हैं.
Wednesday, March 5, 2008
मैं और मेरी भड़ास अक्सर आपस में ये बातें करते हैं...
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4 टिप्पणियां:
ए महराज, आप तो अकबकाने लगे भड़ास भड़ास भड़ास.....। का, सपना ओपना में भड़ास आने लगा का? जाये देहिं, रउवा छोड़िं ओह सबे के, उ सब चूतिया हउवें, आप बुद्धिमान मनई लोग अब आपन काम देखीं। लौंडन लपाड़िन के चक्कर में वैसे भी ना पड़े के चाही। अब जाये देहीं, जवन भयल तवन भयल। बीति ताहि बिसार देहीं। आगे क सुधि लेहीं। बचवा लोग से कवनो गलती वलती भयल होई त रउवा माफ करीं। बड़का भाई लोग क काम होत बा माफ कयल, लइका लोग त गलती करते रहे ल। उनकरे बात के दिल से ना लगावल जाला। जाये देहीं....छोड़ीं। अब चुप हो जाईं...।
आप क
जय भड़ास वाला भाई ....यशवंत
mere khyal se to ab bahas khatm ho gayi hai
aap abhi tak kyo peeche pade hai
ठीक है. नहीं पडूँगा.
क्वालिटी तो बड़ा दुरुस्त है, प्यारे..
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