जो लोग भी बोलने की आज़ादी की बात कहते हुए इस शीर्षक से बिदकना चाह रहे हैं उनसे निवेदन है कि वे पहले इस और इस पोस्ट को पढें और इनमें उल्लिखित नामों में पहले अपना, अपनी माँ या बहन का नाम शामिल कर लें. अगर इसके बाद भी आप बोलने की आज़ादी का समर्थन करते हुए इस सिलसिले के पक्ष में खडे हैं तो मुझे आपसे कुछ नहीं कहना है.
अगर आप पूछ रहे हैं कि फिर क्या किया जाए? तो आइये कहें कि सभी हिंदी एग्रीगेटर इस ब्लॉग की प्रविष्टियाँ दिखाना आज और अभी से बंद करें. फिलहाल इतना ही.
भाई अविनाश इस सिलसिले में एक लंबी पोस्ट की तैयारी कर रहे हैं और कारणों को स्पष्ट करेंगे.
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कृपया यहाँ टिप्पणी करके समय नष्ट न करें-और....
उदाहरण के लिये ब्लॉगवाणी से भडास का एफीलियेशन ख़त्म कराने के लिये निम्नलिखित संदेश को कॉपी करके blogvani@cafehindi.com पर अभी भेजें.
चिट्ठाजगत को इस पते पर लिखें chitthajagat@chitthajagat.in
"हम समझते हैं कि http://bhadas.blogspot.com नाम का हिंदी ब्लॉग चरित्रहनन और मुख्यतः गाली गलौच के कामों में लगा है इसलिये कृपया इसकी सदस्यता तुरंत खारिज की जाय."
इस विषय पर मिलती जुलती प्रविष्टियाँ यहाँ देखें-
मैथिली जी, क्या भड़ास को बैन किया जा सकता है? लें कि तजें.. जो उगला गया है?..
भडास भी अंततः मर्दवादी है
इनकी नंगई प्रगतिशीलता है हमारी प्रतिबंध लायक़
भडास विरोधी मोर्चा...
Friday, February 29, 2008
भड़ास को बंद करो
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34 टिप्पणियां:
मेल कर दिया है. अभी ब्लॉगवाणी को ही किया है. चिट्ठाजगत का भी पता साथ चिपका दिये होते..
one should formally send a complain even to BLOGGER.
आपसे पूरी तरह सहमत,
अभी अभी ईमेल भेजी है ।
इतने सारे प्रतिष्टित लोग भडास में शामिल है।
विनीत उत्पल - विनीत उत्पल और मीडिया हंगामा
सुरेश चिपलूनकर - महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर
सिद्धार्थ जोशी - ज्योतिष दर्शन, दर्शन और अध्यात्म
शंकर कुमार - गुजरा जमाना
शम्भू चौधरी - ई-हिन्दी साहित्य सभा
प्रशांत प्रियदर्शी - मेरी छोटी सी दुनिया और तकनीकी संवाद
डा. कमलकांत बुधकर - कुछ हमरी सुनि लीजै
डा. अजीत तोमर - शेष फिर...
सचिन श्रीवास्तव - नई इबारतें
पंकज पराशर - ख्वाब का दर
अविनाश वाचस्पति - नुक्कड़ब्लाग, झकाझक टाइम्स
अजीत कुमार मिश्रा - अजीतकुमार मिश्रा
अतुल चौरसिया - चौराहा
आशीष महर्षि - बोल हल्ला
गिरीश बिल्लोरे मुकुल - बावरे-फकीरा
गुलशन खट्टर - परदेसी
गौतम यादव - मुझे कुछ कहना है
दिलीप डुग्गर - नई उम्मीद
नीरज राजपूत - गुनाहगार
रविशेखर श्रीवास्तव - शेखर की बात
राजीव जैन - शुरुआत और ब्लाग खबरिया
राजीव तनेजा - हंसते रहो
विशाल शुक्ला - कुछ दिल की
संदीप पांडेय - कवितायन
ये शामिल लोग क्या सोचते हैं?
Anonymousji, apna naam pata bataya hota to me batata blogger ko kaise complaint kar sakte hain, bahut aasan hai
अभी मेल भेजा।
अभी भेजा मेल।
अन्नपूर्णा
अभी भेजा मेल।
अन्नपूर्णा
Irfan Bhai, I agreed with you. I am deadly against to use this type of language for my killer also. I shall write on this issue on ANVARAT after reaching Kota.
sent mail! dats very ugly episode!
इरफानजी, भड़ास का सदस्य होने के नाते मैने यशवंत जी से अपनी असहमति जताई दी थी।
आप जानते हैं कि इस प्रकरण में बिलकुल आरंभ में ही यशवंत को ब्लॉग पर लिखकर अनुरोध किया था। उसके बाद भड़ास वालों ने जितनी गालियॉं मनीषा को दी हैं ठीक उतनी ही हमें भी दी हैं बाकायदा पोस्ट के शीर्षक में लिखकर जैसे यहॉं1, यहॉं2, यहॉं3, यहॉं4
कमेंट में लिंक लगाने में दिक्कत होती हे इसलिए और गिना नही रहा हूँ।
इसके बावजूद मेरा कहना है कि बैन की बात न की जाए। मनीषा को, चोखेरबाली को और उनके सरोकारों को हमारा समर्थन है किंतु जो संघर्ष सत्ता के कंधे पर चढ़कर लड़े जाते हैं वे जल्द ही एप्रोप्रियेट कर लिए जाते हैं
दूसरे मुनव्वर या 'मनीषा हिजड़े' के वास्तव में होने न होने की हमारी आश्ांकाएं एक ओर पर उनसे प्रमाण मांगने जैसी रवायते एकदम गैर ब्लॉगिंग लाइक हैं।
हॉं फ्लैग करना एकदम जायज अधिकार है किसी भी पाठक का उसे बिल्कुल इस्तेमाल करें पर मैथिलीजी से अनुरोध है कि बैन आदि के कदम से बचने का प्रयास करें
वैसे समय कैसे बदलता है, आज अविनाश आदि बैन की वकालत कर रहे हैं, और नारद से नहीं ये मैथिलीजी से किया जा रहा और नारद पर तो अब बैन करने की सुविधा ही हट गई है..
irfan ji, i have sent a request to u to join my list of friends in g chat. i am trying to read what u have asked me to read. its more or less a torture. the 1st post is in a dialect which, specially with the filth, is tough to read and comprehend.the 2nd post ... it hardly deserves any attention. i agree with u that it is filthy.
there r a few ppl whose writings r so twisted like their minds that its preferable not to read them. i have given a lot of thought to the idea of bhadas and sometimes the idea of it acting as a catharsis seems sensible, but sometimes a lot of bloggers there defy my comprehension.
i have just read these 2 posts and yet have not understood who they r referring to and what exactly r they trying to say.
do u remember the episode of rahul or some such person's blog being removed from narad last year. a lot of ppl protested with some justification and the whole thing left a bad taste in mouth and harmed narad more than the blog it banned.
i am still thinking and can't make up my mind easily. its better to think and then act.
reagards and thanks for writing to me.
gb
( i am writing in english , perhaps because ia m totally goofed, confused and don't know how to express myself. hope u do not take it otherwise. the next mail if any will be written in hindi.)
-Ghughuti Basuti
भडास से आशीष ने ख़ुद को अलग कर लिया है. मैं उनके विवेक और फैसला लेने में दिखाई तत्परता में उनकी समझदारी पाता हूँ. ब्रैवो.
हालिया मसला तो गंभीर है ही। हम मनीषा के साथ हैं उस पोस्ट से ही जिस पर से बवाल शुरू हुआ। भड़ास के उद्धेश्य को लेकर मै शुरु से सशंकित था, और वही हुआ । पाखंड और छिछलापन दिखाने का खुला आमंत्रण भड़ास के नाम पर । गोया इस देश के नौजवान साइबेरिया के कंसेन्ट्रेशन कैंप में रह रहे हैं। उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी भी नहीं है। कमाल है। अधकचरी सोचवाले जुड़ते चले गए। भेड़चाल में। जैसे कोई घटिया फैशन प्रसार पाता चला जाता है। अजीब तब लगा जब पढे लिखे लोगों ने इस प्रवृत्ति को यूं सराहा मानो क्रांति हो गई है। चौराहे पर खुद के कपड़े फाड़ना और दूसरे पर कीचड़ उछालना क्रांति है ? ग्रुप ब्लाग के जरिये अपनी ताकत का दिखाने का भी फैशन चल पड़ा है इन दिनों। क्या नया विचार दे दिया है भड़ास ने बीते अर्से में। ये तारीफ करने वालों को भी सोचना चाहिये था कि परख किसकी कर रहे हैं । क्या सही है और क्या ग़लत की समझ क्या इतनी कठिन है कि भड़ास का मतलब न समझा जा सके।
चलते रास्ते पिच्च से कहीं भी थूकने ,चलते रास्ते गालियां बकने, राह चलती औरतों को घूरने, उनसे रिश्तेदारी की बातें सोचने , उन्हें बेइज्जत करते वक्त अपनी माँ बहनों को भूलने और बेशर्मी के साथ इतराने वाले हर गली, मोहल्ले, चौराहे पर मिलने वाले हिन्दुस्तानियों को क्या सचमुच किसी भड़ास जैसे मंच की ज़रूरत थी ?
मैंने पहले भी कहा था कि ब्लॉग एग्रीगेटरों के आगे जहाँ और भी हैं - यानी ब्लॉगवाणी या नारद या चिट्ठाजगत पर किसी चिट्ठे को बैन करवाने से किसी को कोई प्रतिफल नहीं हासिल होगा. और भी दूसरे जरिए हैं ब्लॉगों के पढ़ने के. लोग स्वयं के फ़ीड रीडर से पढ़ सकते हैं, सीधे वहीं जा कर पढ़ सकते हैं. यदि एक भड़ास बंद होगा तो दस नए चालू होंगे, और ऐसा तो होना ही है. आगे आप देखेंगे कि हिन्दी में भी ढेरों आपत्तिजनक सामग्री युक्त ब्लॉगों के ढेर लगने वाले हैं. बस, तकनीक को जरा सुगम होने दीजिए, सर्वत्र-सर्वसुलभ होने दीजिए. अभी ही लोग एक दूसरे को लक्ष्य कर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं - भाषा संसदीय हो या असंसदीय ये सवाल तो ख़ैर जुदा ही है. तो सवाल है कि कहाँ कहाँ और कितने कितने किस किस पर बैन लगाते रहेंगे. हाँ, ब्लॉग की सामग्री यदि ऑब्जैक्शनेबल है तो उसे फ्लैग किया जा सकता है, और ताजा स्थिति में भड़ास पर फ्लैग लग चुका है. जाहिर है, सबसे अच्छा विकल्प है - अनदेखा करना.
पता नहीं किसी को याद हैं या नहीं पर मैने अकेले subash बहदोरिया की पोस्ट का विरोध किया था जब उन्होने अपनी पोस्ट स्त्रियाँ सपनो मे क्यो आती हैं लिखी थी , और मैने स्वयं मेल दे कर उनसे इस पोस्ट को डिलीट करवाया था जिस मै मेरा साथ शास्त्री जी ने , दुर्गा , यतीश और अमित ने दिया था . उस समय मैने ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत दोनों को मेल भी दी थी और ब्लॉग वाणी के ऑफिस फ़ोन भी किया था की भडास और सुबाश के ब्लॉग को अग्ग्रीगेटर पर मत लाये और क्योकी ऐसा नहीं हुआ मैने ब्लॉग वाणी से अपना ब्लॉग हटवा दिया था फिर मैने पुनेह चिट्ठाजगत को join किया क्योकि किसी ने भी उस समय इस बात को सीरियस नहीं लिया . मेरा सबसे निवेदन हैं की अगर भडास को ब्लॉग वाणी और चिट्ठाजगत से न हटाया जाये तो हम सब को अपने ब्लॉग उस अग्ग्रीगेटर से हटा लेने चाहिये . विरोध करे तो सब मिल कर सबके लिये करे पुरजोर विरोध करे क्योकि इंटरनेट पर आप जो लिख रहे हैं उसे कोई न कोई न कोई जरुर पढता हैं
(पूरी संभावना के शाथ कि कल कोई नीलिमा नाम की हाइनेस किन्नर भडास पर अवतार ले सकती है )बहुत शर्मनाक ! भडास की अधोगति पर कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है ! आश्चर्य यह है कि भडास से कुछ काफी संतुलित और संवेदनशील विचार रखने वाले लोग भी जुडे हुए हैं पर फिर भी उस ओर से भडास के पतनतम रवैये पर कोई कडी प्रतिक्रिया नहीं उठी ! क्यों ? और क्यों केवल शुद्ध कुरुचिपूर्ण अभ्व्यक्ति कर रहे 2-4 भडासी ही सारा मंच घेरे हुए हैं ?
I strongly condemn Bhadas, if this is true.
But I think Chokherwali also have some responsibility in letting Yashwant to post in their blog, not removing that post, even after our protest, and not opening the front.
It is good of you and avinash to write about it, but in my opinion
this is a bit of haste. you close bhadaas and they will open 10 new
ones. and this war is going to be more ugly. and I believe this is not the solution.
WE HINDI BLOGGERS NEED TO HAVE A CIVIL TALK.
I had earlier commented
in your patansheel post and also in one of the post in Mohalla, which
seems objectonable to me. I believe the best course is that you
remove your post, and avinash remove all the photos of the nude
womens, no matter in whatever context, and say sorry.
Then only you have right to condemn bhadas.
@neelima
bahut hee daer sae aap ne yae baat kahin , jab maene mail mae aur kament mae bhadaas ko chokher bali sae hataane kae likyae kehaa tha to aapne kyon react nahin kiya . kyon swapn darshi kii post ko critisize kiya gaya jisaey unhaoney yashwant kii post kae turant baad daala . hamare natik mulyae hamesha ek saey kyon nahin hotey . 5 memebers mae chokher bali shuru karen walo mae mae bhi thi phir kyon maere virodh per yashwant kii post ko as it rehnae diyaa gayaa . chokhaer bali sabse jyaada utardaaii haen is chapter kae liyae kyoki unhone khud bhadaas ko nimentrn bheja . ab hijrae aayegae to dholak aur taali hi peetaegae neelima ji , aap nae hamara saath nahin diya kyoki baat nahin per ham aap ke virodh mae aap ke saath hae
Dear Irfan,
Dont even spend time on sending these mails - one because you really
cannot stop them but more importantly, the only way to respond is to do
our own things more intensely. You know it better than me.
Irfan, times are different and we just have to continue with our values.
Incidentally, I will be in Delhi tomorrow evening. Would you be free to
meet? I will be staying in JNU? I can come and visit you if you give me
an address,
Laltu
इरफान जी, आप की पोस्ट पर दिये गये जब दोनों लिंक्स पर क्लिक किया तो सारा माजरा समझ में आ गया। कुछ लाइनों के बाद पढ़ने की हिम्मत ही नहीं हुई । लेकिन हिंदी के प्रयोग का यह रूप, यकीन मानिये, आज पहली बार देखा और बहुत शर्म महसूस हुई। मैं तो पिछले तीन चार महीनों से ही हूं इस बलोगर पर , लेकिन मेरा तो यही इम्परेशन था कि यहां तो सब कुछ हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार बहुत ही शिष्टाचार पूर्वक चलता है। लेकिन आज तो यह सब पढ़ कर दिमाग घूम गया, इरफान भाई। लेकिन जब टिप्पणीयों वाले पेज को स्क्रोल कर रहा था तो रवि रतलामी की जी टिप्पणी से भी बहुत सी बातें ग्रहण करने को मिलीं।
दिलीप मंडल ने कुछ समय पहले मोहल्ले पर अपनी एक पोस्ट में इस भय को अभिव्यक्ति दी थी कि कहीं हिन्दी साहित्य वाला रोग ब्लॉग को न लग जाए। इधर उसके बाद इस ब्लॉग जगत में जो जो कुछ हुआ है वह दिलीप मंडल को महसूस हुए आसन्न भय से भी ज़्यादा डरावना है और मुझे यह स्वीकार कर लेने में बहुत शर्म महसूस हो रही है कि जिस हिन्दी साहित्य की कुकुरगत्त करने में आत्ममोह में आकंठ डूबे चुनिन्दा रचनाकार-आलोचकों की सेना को सवा शताब्दी से अधिक समय लगा था, उसकी टक्कर का महाकार्य करने में ब्लॉगवीरों की एक जमात ने कुछ महीने भर लिए। यानी रसातलयात्रा अभी और आगे तक जारी रह सकने की भरपूर गुंजाइश है।
आज इरफ़ान, अविनाश और सुजाता और कुछ अन्य लोगों की पोस्टों में इस महाकार्य से उपजी खीझ की तार्किक और आवश्यक परिणति है। भड़ास नाम का ब्लॉग के प्रमुख मॉडरेटर जब काफ़ी शुरू में हमारे समय के सबसे सचेत कवि वीरेन डंगवाल को उदधृत कर रहे थे तो लगता था कि शायद हिन्दी पत्रकारों की किसी उतनी ही सचेत जमात आप से रू-ब-रू है। उस के बाद भाषा की दुर्गति करने का जो कार्य लगातार इस ओपन स्पेस में किया गया, वह गलीज और तीव्र पतनगामी होता चला गया और उस के बाद स्त्रियों को लेकर जिस तरह की अश्लील ज़बान में तंज़ कसे गए, वह मेरे हल्द्वानी शहर के सबसे हलकट और कमीन गुण्डों को शर्मसार करने को पर्याप्त थे।
फिर चोखेरबाली और अन्ततः मनीषा पाण्डेय इस दिशाहीन, चरित्रहीन 'मुहिम' के निशाने पर आते हैं। अब यह 'मुहिम' (इसे 'डिफ़ेन्ड' तक करने को यहां तर्क-कुतर्क पेश किए जा रहे हैं)। भड़ास नाम के ब्लॉग के प्रमुख मॉडरेटर ने यदि वीरेन डंगवाल (जो हमारे कबाड़ख़ाने के श्रेष्ठ कबाड़ियों से सरगना भी हैं) को पढ़ा है ('गुना है' पढ़ा जाए) तो वे वीरेन दा की "रक्त से भरा तसला हैं हम औरतें" वाक्य से शुरू होने वाली कविता की आखिरी पंक्ति से ज़रूर परिचित होंगे: " वंचित स्वप्नों की चरागाहों में हमें चौकड़ियां तो भर लेने दो, कमबख़्तो!"
अपनी भाषा और अपनी औरतों के साथ जाने-अनजाने बुरा व्यवहार करने वाली क़ौमें उजड़ जाने के लिए अभिशप्त होती हैं।
कविता-स्त्री विमर्श-समाज-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-सरोकार वगैरह शब्द सुनने-बोलने में बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन इन विषयों में डील करते हुए जिस मर्यादा और भाषाई संयम की दरकार होती है, उस लिहाज़ से भड़ास का एकमात्र एजेन्डा यह लगने लगा है कि किसी भी तरह यहां ब्लॉग के संसार में भी आत्ममोह में लिथड़ी लिजलिज पैदा की जाए ताकि इस नवीन और अतिप्रभावी माध्यम में आने वाली पीढ़ियां हमारी पीढ़ी को लगातार गालियां देती जाए। यह तय है अभी और भी विवेकवान और ऊर्जावान युवतर पीढ़ियां आने वाले सालों में अपने लिए और बाकी लोगों के लिए इस ओपन स्पेस को कई गुना अर्थपूर्ण बनाएंगी। रहा सवाल भड़ास से पैदा हुई मेरी व्यक्तिगत निराशा और वितृष्णा का तो अपने अज़ीज़ दोस्त नूर मोहम्मद 'नूर' का एक शेर पेश करते हुए मैं इरफ़ान की हर बात का अनुमोदन कर रहा हूं:
बेमुरव्वत सभी बेदर्द लुटेरे निकले
जिनको मल्लाह समझते थे लुटेरे निकले
(ताज़ा समाचार यह है कि भड़ास पर मनीषा पाण्डेय का मोबाइल नम्बर तक सार्वजनिक कर दिया गया है। इस कृत्य की सराहना तो क़तई नहीं की जा सकती। बस साहब लोगों से इस नम्बर को तुरन्त हटाने का अनुरोध ही किया जा सकता है।)
*इस टिप्पणी को मैं 'कबाड़ख़ाने पर स्वतंत्र पोस्ट की तरह भी लगा रहा हूं.
gaaliyon se bharey blogs kholney me bhi badi sharmindagi mehsuus hoti hai......vaisey ravi ji ki baat se sehmat huun ki in blogs ko andekhaa kiya jaanaa chahiye
Kuch asar to hua, bhadasi dictionary ke kuch panne gayab ho gaye, they removed that particular portion of that post,
मेल भेज दिया है हमने भी।
worse is about to happen friends ! by giving them so much tavajjo we r perhaps imparting them importance which they surely don't deserve.
what needs to be condemned ,my dear friends, is CHOKHER BALI and its moderator who has gained most out of this controversy! MANISHA,on the other hand, also deserves to be taken to task. afterall she is not a bachchi. after talking so open now she is being projected as a victim. my dear irfan and ashok bhai Bhadaas needs to be bycotted but CHOKHER NEEDS A BLANKET BAN!!
एक महिला साथी का मोबाइल नंबर सार्वजनिक करना एक आपराधिक कृत्य है लेकिन रवि रतलामी जी की बात से सहमत हूँ प्रतिबंध का न तो कोई अर्थ है, न ही वह सही क़दम है, भड़ास पर जाना, न जाना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है. उसका बहिष्कार किया जा सकता है लेकिन प्रतिबंध लगाने का कोई मतलब नहीं है.
इस मामले पर एक निंदा प्रस्ताव का पोस्ट लाए जाने की ज़रूरत है जिस पर अधिक से अधिक ब्लॉगर टिप्पणी के रूप में अपने हस्ताक्षर दें.
इस टुच्ची हरकत से मुझे आघात पहुँचा है, और मैं सोच रहा हूँ कि क्या इस ब्लॉग कम्युनिटी से अपने आप को जोड़े रखना सही होगा? माफ़ी चाहता हूं कि मुझे पता नहीं था कि यहाँ इतनी गलाज़त भरी है. सिर्फ़ इस मामले में नहीं, जेनरली ढेर सारे ब्लॉगरों के मानसिक संतुलन पर शक होने लगा है. दुखी हूं.
सबसे परिपक्व , यथार्थवादी, व्यावहारिक और जगाने वाली टिप्पणी मुनीश भाई की लगी। बधाई मुनीश भाई ज्ञानचक्षु खोलने के लिए । इरफान भाई, ये मुनीशजी का मेल दीजिएगा। वैसे, अभी पांडे जी से ही बात हो रही थी पर तब तक ये टिप्पणी पढ़ी नहीं थी।
मुनीश पुनः उवाच-
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क्यों भाई गाँव में नए आये हो क्या ? सिर्फ़ ये सवाल बनता है मेरे अजीजोंमेरे हमवतनों तुम सब से पूछने का ! तुम जो अपना वक़्त , अपना हुनर, अपनी सलाहियतें बरबाद करने पे आमादा हो एक कभी न ख़त्म होने वाली बहस में। मानो तुम सब कॉलेज या यूनिवर्सिटी के दिनों को फ़िर से जीने की एक अमिट प्यास के शिकार हो ,जब तुम्हारी पार्टी ,हाउस या क्लास की किसी लड़की को कोई छेड़ देता था और निकल पड़ते थे तुम हाकियाँ लेकर उसकी तलाश में ! ये cyberspace है बाबू जहाँ नवजात बालक को माँ से जोड़े रखने वाली नाल के मांस से व्यंजन बनने की तस्वीरें हैं , पशु मैथुन में रत औरत और मर्द हैं , अनाचार के लिए बच्चों को फुसलाते chatter हैं और वो सब है जिसे देख, सुन कर रूह फड-फडा जाए बाऊ जी ! इरफान भाई आज से पहले इमान से 'भडास 'को देखा तक नही था, अपने लिंक दिया सो देखा और दुनिया भर ने देखा । आप उसको ban करने की बात कर रहे हैं -ठीक !और उस चोखेर बाली का क्या जो इस सारे फसाद की जड़ है यानी उसकी moderator ! विमल भाई और यूनुस तो कभी इस तरेह की बेकार बहस में नही पड़ते मगर आपको और अशोक bhaai को जाने क्या चाव है झंडा बर्दारी का !
ये कोई बच्चों का play ground नहीं है daada यहाँ के rules अलग हैं आप मस्त रहो , bhaad में जाए दुनिया एक बढ़िया sa gaana सुना दो buss !! mood kharaab kar rakkha hai chaar din se!!
-मुनीश(सस्ता शेर-http://www.ramrotiaaloo.blogspot.com में.)
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