Monday, January 28, 2008

मंगलेश डबराल के साथ कल की शाम और ब्लॉगजगत पर उनकी राय

मई 2007 से मैं अपने इंटरनेट कनेक्शन को जिलाए हुए हूँ. हर महीने इसका बिल चुकाते हुए यह मुझे किसी क़दर उल्झन में डालता रहता है. इस महीने का बिल मैंने अभी तक जमा नहीं किया है और हालात अभी गवाही भी नहीं दे रहे हैं कि मैं बिल चुकाऊँ. एयरटेल के धमकी भरे फ़ोन आने शुरू हो गये हैं और अगर वे बहुत मेहरबान न रहे तो आजकल में वे इस कनेक्शन को डिस्कॉंण्टीन्यू कर देंगे. इस सिलसिले में आपसे आग्रह है कि ज़रूरी समझे‍ तो इस बिल को चुकाएं. तरीक़ा आसान है- Airtel (A/c 12861198) के पक्ष में रुपये 2381/-(दो हज़ार तीन सौ इक्यासी रुपये) का एक चेक एयरटेल के ड्रॉप-बॉक्स में डालकर मुझे चेक नंबर और अपने बैंक का नाम बता दें.
कल शाम गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल की स्मारिका की तैयारियों के सिलसिले में मैं, संजय जोशी और कथाकार योगेंद्र आहूजा मंगलेश डबराल के घर जुटे. स्मारिका प्रकाशन की इस टीम की अगुआई मंगलेश जी कर रहे हैं. बातों-बातों मे ब्लॉग की भी बात चल निकली. सुबह नवभारत टाइम्स में उन्हें पढा और फिर एक बार उनकी बातें सुनीं.
वे फिर इस बात को दुहरा रहे थे कि जब तक हम इस मंच का उपयोग रिजेक्ट माल के लिये करते रहेंगे तब तक यह अपनी प्रभावकारी भूमिका में नहीं उतरेगा. जन्मदिन की बधाइयां भेजना संदर्भच्युत ढंग से आत्मनिंदा और आत्मप्रचार, आत्मप्रशंसा ब्लॉगों में बहुत है. अगर यह एक ऐसा मंच है जिस पर आप वह बात भी कहना चाहते हैं जिसके लिये औपचारिक मंच उपलब्ध नहीं रह गये हैं तो वो बात कहनी चाहिये. उन्होंने बॉन में कार्यरत अपने भतीजे शिवप्रकाश जोशी के कल रात आए एक फ़ोन का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें बाबरी मस्जिद के ध्वंस के पंद्रह साल पूरे होने पर सिर्फ़ कबाडख़ाने पर एक नज़्म मिली. अपने समय और समाज के ज्वलंत सवालों पर चिंताओं का व्यापक स्वरूप यहाँ नहीं दिखता और किसी काँसिस्टेंसी के साथ प्रश्नों पर विचार-विमर्श भी नहीं दिखता.

7 टिप्पणियां:

चार्वाक said...

मंगलेश जी ठीक कह रहे हैं. चिट्ठों को वैकल्पिक मीडिया बनना है. तभी उनकी सार्थकता है.

Pramod Singh said...

मंगलेश को सस्‍ता शेर दिखलाकर, और सुनाकर तुमने उपकृत नहीं किया? च्‍च्-च्‍च्‍च्!

munish said...

Duniya vahi dekhti hai jo vo dekhna chahti hai. ab dekh lo kya in tippnikartaon ne bill sambandhi baat nahi padhi hogi?
Gita ji me aise hi purushon ko sthitpragya kaha gaya hai shayad.
he bhagvaan tu hi kuch kar.

Lavanyam - Antarman said...

व्यक्तिगत स्वतँत्रता, किसी भी देश या वाद के अनुशासन से मुक्त विधा है ब्लोग जगत की .
इसका विकास भी , उसकी कुदरती गति से होगा ना कि किसी के कहने पर !
या हम यूँ क्योँ न कहेँ ,
कि सभी, उनकी मरजी के मुताबिक ही लिखेँगेँ !
-- विश्वजाल के जरीये,
सभी को एक समान तखत मिला है -
- कोई ऊँचा नहीँ कोयी नीचा नहीँ --
मनुष्य मात्र को, अभिव्यक्ति, स्वतँत्रता और आत्म सँतुष्टी से मूल भूत लगाव रहा है और आज के सँचार युग मेँ ये खुलकर, दीखलाई दे रहा है --
-- लावण्या

munish said...

वैसे प्रमोद जी से ये उम्मीद नहीं थी के वो सस्ता शेर पर यूँ तंज़ करेंगे ! चलो ये तो पता लगा के वो पढ़ते तो हेंगे सस्ते शेर क्यों जी?

Pramod Ranjan said...

मंगलेश जी की बातों से कुछ हद तक तो सहमति बनती है लेकिन यह भी एक सच्‍चाई है कि वह ब्‍लॉग की मूल प्रकृति को समझ नहीं पा रहे हैं. दूसरी बात जो मुझे उनकी नवभारत टाइम्‍स वाली टिप्‍पणी पढते हुई महसूस हुई कि उन्‍होंने अपनी राय मुख्‍यत: मोहल्‍ला तथा एक दो और ब्‍लॉगों को ही ध्‍यान में रखते हुए बनाई है. पूरी टिप्‍पणी यहां देख सकते हैं -

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2734203.cms

इस टिप्‍पणी में वह कहते हैं ''उनमे (ब्‍लॉगों में)ज्‍यादातर गपशप का माहौल है या गंभीरता के नाम पर छोटी छोटी पॉलिमिक्‍स बहसें हैं, जिनमें भडास या कुंठाएं निकाली जाती हैं या कोई सनसनीदार साहित्यिक चीज पेश की जाती है ''. हालांकि मोहल्‍ला पर दो तीन अच्‍छी , गंभीर कही जाने लायक चीजें भी आईं हैं. और अब कम्‍युनिटी ब्‍लॉग बनने के बाद कुछ विवेकवान लोग उससे जुड रहे हैं . सो हिंदी के इस सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग के सार्थक भी हो सकने की उम्‍मीद तो की ही जा सकती है.
लेकिन अब तक की जो स्थिति कुल मिलाकर रही है उसके आधार पर मंगलेश जी की बातों से सहमति बनती है. (..हालांकि कुछ और अच्‍छे ब्‍लॉग हैं जिनपर कतिपय अच्‍छी सामग्री होती है. मसलन, कस्‍बा, हाशिया या आपका ब्‍लाग ..)

किंतु इसके अलावा मंगलेश जी कहते हैं कि '' कुछ लेखकों के ब्लॉग शायद अनजाने में ही आत्म विज्ञापन का साधन बने हुए दिखते हैं, जिनमें उनकी रचनाओं के साथ उनकी आगामी पुस्तकों के चित्र भी चिपके होते हैं'' ऐसा लगता है उन्‍होंने बेहद कटू शब्‍दों में यह बात हिंदी एक समर्थ कवि, कथाकार के ब्‍लाग पर कही है . और यहीं मंगलेशजी चूक कर गए हैं ... और इरफान भाई यह एक ऐसी चूक है जिस पर 'गंभीरता' से ध्‍यान दिया जाना चाहिए. चुंकि यह एक बडे कवि की चूक है इसलिए यह कुछ ' बडे दिग्‍भ्रम' भी पैदा कर सकती है. इसी चूक के कारण मंगलेश जी अपनी टिप्‍पणी में ब्‍लॉग की वास्‍तविक निजता , उसकी मूल प्रकृति के ही विरोध में जा खडे हुए हैं. वह मूल प्रकृति है उसका ' वयक्तिगत' होना. ब्‍लॉग का बेहद खूबसूरत हिंदी अनुवाद है 'चिट्ठा'----कच्‍चा पक्‍का जैसा भी ! जिस वैक‍ल्पिक कथ्‍य की अपेक्षा वह रख रहे हैं, उसे मैं 'कच्‍चा चिट्ठा' कहना चाहूंगा.

यह सदि्च्‍छा तो अच्‍छी है कि '' ब्लॉगों को मुख्य मीडिया से ज्यादा जिम्मेदार होना होगा ताकि वे 'ब्लॉग-ब्लॉग' खेलने तक सीमित न रह जाएं '' लेकिन क्‍या ऐसी ही अपेक्षा हमने लघु पत्रिकाओं से भी न की थी कि वे बडी पत्रिकाओं, बडे पूंजी वाले प्रिंट मीडिया के बरक्‍स वैकल्पिक विचार दें ? लेकिन क्‍या यह सच नहीं है कि हिंदी में जो सैकेडों लघुपत्रिकाएं छपतीं हैं, उनमें से 98/99 प्रतिशत 'पत्रिका. पत्रिका' ही खेलती रही हैं. हमने उनमें से सार्थक काम करने वाली पत्रिकाओं को चुना है. यही काम ब्‍लॉगों के संदर्भ में भी करना होगा.

हिंदी चिट्ठों जो अगंभीरता अभी दिख रही है उसका एक कारण तो यह है कि अभी बहुत कम लोग इस दिशा में सक्रिय हैं. संख्‍या बढने पर स्‍वभावत: इनमें विविधता भी बढेगी . इसके अलावा क्‍या यह विचारणीय नही है कि स्‍वयं 'हिंदी' की वैचारिकता का ही क्‍या हाल रहा है?

क्‍या यह सच नहीं है कि स्‍वयं हिंदी का लेखन अपनी तमाम '' नेकनीयती के बावजूद अभी तक अराजनैतिक, व्यक्तिगत, रूमानी, भावुक और अगंभीर है''. ( बल्कि मंगलेशजी के इस वाक्‍य में मैं 'वर्णवादी' और ' पुनरूत्‍थानवादी' भी जोडना चाहूंगा. )

जाहिर है चिंताएं और भी हैं तथा इन दिनों और गंभीर होती जा रही हैं. 'हंस' जैसी प्रखर पत्रिका में तेज गिरावट देखी जा रही है तो दूसरी ओर 'पहल' जैसी गंभीर पत्रिका में 'हल्‍कापन' आया है. ऐसे में ब्‍लॉगों से ही कुछ बहुत खास कर गुजरने की उम्‍मीद तो नहीं ही की जा सकती . हां, इतना जरूर है कहूंगा कि यह मूलत: अस्‍थापितों का अख्‍यान है. इसकी निजता इसका 'व्‍यक्तिगत' होना है.

निशान्त said...

मेरे भी २ पैसे -
वैसे मेरी कोई औकात नही है.. मंगलेश पर कुछ भी बोल पाने की. फ़िर भी जुर्रत कर रहा हूँ -
हिन्दी ब्लॉग या चिट्ठों में जो ज्यादा सक्रिय हैं, वो मीडिया से जुड़े लोगों के हैं. इसलिए शायद हम ब्लॉग को मीडिया का पर्याय समझाने की कोशिश करते हैं. तकनीकि दृष्टिकोण से देखा जाए तो ब्लॉग एक डायरी के समान चीज़ है. इससे आप इ-मेल, बुलेटिन बोर्ड, इंटरनेट फॉरम से विकसित रूप में देखने की कोशिश की जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा. ब्लॉग बहुत ही पर्सनल चीज़ है. और मैं अपनी डायरी में मंगलेश जी या बाकी लोगों की तरह तो लिख नहीं सकता. मैं अपनी समझ से ही अपनी डायरी के पन्ने गंदे करूंगा. ऑनलाइन डायरी से अखबार और पत्र पत्रिका बनने के लिए समय देना उचित होगा. जो भी ब्लॉग चर्चित हैं - वो अपने कंटेंट की वजह से हैं और आगे भी रहेंगे. किसी भी मीडियम से केवल अच्छी चीजों को अपेक्षा करना थोड़ा ज्यादा ही मांगना होगा.

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