ये पोस्ट इरफ़ान की नहीं है. ये फ़रज़ाना की है जो कि नोएडा में रहती हैं और एक कम्यूनिटी रेडियो में काम करतीहैं। लिखने पढने का शौक़ है और अभी इंटरनेट पर हिंदी टाइपिंग की काट समझ रही हैं। मेरे एफएम के शोज़ सुनते हुए और टूटी हुई... से गुज़रते हुए उन्होंने मुझे इस क़ाबिल समझा है कि यहाँ उनका लिखा भी जारी हो। मेरे पासरोमन में ये पीस उन्होंने भेजा है जिसे मैं गूगल के ट्रांसलिटरेशन टूल से कंवर्ट करके आपके सामने पेश करता हूँ. फ़रज़ाना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हैं और अलीगढ से स्नातक हैं. अपने दो जवान बेटों और फौजी पति के साथ रहतीहैं. यारों को फरज़ाना सुनकर मेरी शायद उस फरज़ाना की याद भी आई हो जिनका मैं पति हूँ इसलिये meet my wife कहते हुए उनका फ़ोटो जारी करता हूँ. नोएडा वाली फ़रज़ाना के लिये उनके नॉस्टैल्जिया को कोरैबोरेट करता एक गीत अपनी तरफ़ से लगा रहा हूँ जिसे नूरजहाँ ने गाया है.

दस पैसे के सिक्के और बचपन की यादे
बात उस वक़्त की है जनाब , जबकि सिक्कों का ज़माना
रायज था ,,जब पांच पैसे भी एक किस्म की नेमत
होते थे ....मुझे अच्छी तरह से याद है ...कि जब
हम अपनी ननिहाल आया करते थे दिल्ली ,,रहने के
लिए ...तो उस वक़्त कभी कभी हमारी नानीअम्मा जों
कि सब लोगों मॆं अम्मा जी के नाम से मकबूल
थीं ...१० पैसे का सिक्का दिया करती थीं ...और
कहती थीं के जाओ बाहर जाकर ..छोले खा लो ...और
हमारी बाँछें ख़ुशी से खिल जाती थीं कि..
.और बस दिल का कँवल खिल खिल उठता था ...
बात दर असल पैसे मिलने की नहीं थी बल्कि उस
ख़ुशी की थी जो कि बडे लोग आमतौर से हमारी
किसी बात से खुश होकर हमको ५ या १० पैसे दे देते
थे ...और वो उस वक़्त के १० पैसे आजके मेरे ख्याल से
१० रुपए के बराबर तो ज़रूर रहे होंगे ...और फिर
बाहर दरवाज़े के जाकर ...छोले खाना ....जनाब आज
भी उन छोलों का क्या ज़बरदस्त नॉस्टैल्जिया दिमाग
मॆं घर किये हुए है ....न तो अब वो छोलेवाला
है ..और न वो १० पैसे न... अम्माजी और न ही वो
वक़्त ..बल्कि अब तो अपनी माँ भी नही हैं ..सब
अल्लाह को प्यारे हो चुके... लेकिन वो छोलों की
खुशबू और बचपन का वो ज़माना आज भी जेहन के
मरक़ज़ मॆं पालकी सजाये बैठा है... सदियाँ
क़ैद हैं जिनके अंदर, आस उसकी लगाए बैठा
है . ....
ऐसे ना जाने कितने किस्से जेहन मॆं यक बयक सर
उबारते हैं और हम उनको वहीं दबा देते हैं ...कुछ
पल उनके साथ ज़रूर होते हैं ....लेकिन साथ रह
नही सकते क्योंकि जनाब वक़्त का काम तो सिर्फ आगे
ही बढ़ना है ...वो तो सिर्फ अपनी लज्ज़त ही छोड़
जाता है ...और उस लज्ज़त का नॉस्टैल्जिया ...यादें भी
बड़ी ही नॉस्टैल्जिक होती हैं .......कहाँ ट्रांसपोर्ट
कर देती हैं ... बयकवक़्त हम भूल ही जाते हैं ..कि
हम आज टेक्नोलॉजी के ज़माने मॆं हैं ...और देखिए
इसी टेक्नोलॉजी, के ज़रिये अपनी उस खस्तगी का एहसास आपको
दिला रहे हैं जों हमने कभी उन १० पैसे के छोले के
दोने मॆं महसूस की थी ...पर क्या करें
जनाब ....चंद घडियाँ थीं बचपन की जोकि वक़्त
की मुठ्ठी से ऐसे सरक गयीं जैसे के रेत .....कोई
लहर आती है और सब कुछ अपने साथ बहा ले जाती
है ...तो जनाब ऐसा ही कुछ सुलूक बचपन के साथ
भी वक़्त ने किया .......और हमारा हँसता खेलता
बचपन ...कहीं वहीं आज भी बाहें पसारे हमको
दुहाई देता है ...हम उसके साथ कुछ पल गुजार कर
और उसे वहीं लोरी गाकर और थपककर सुला देते
हैं ...कि फिर किसी दिन उसकी आग़ोश मॆं पनाह
लेंगे ...और उन सब लोगों को याद कर लेंगे जिनसे सब
कुछ सीखा है ..और आज उन्ही की बदौलत हम यहाँ
पर ये किस्सागोई करने पर मजबूर हैं .....और वो
छोलेवाले बाबा तो कहीं हमारे ननिहाल का एक बड़ा
हिस्सा हुआ करते थे क्योंकि कोई आने-जाने वाला ऐसा
नही था जिसने उनके छोलों की लज्ज़त को न चखा हो
और उनकी नाज़ुक मिजाजी का ये हाल के बस ग़ुस्सा हर
वक़्त ही नाक पर रखा रहता था ..... वो बहुत ही
नाज़ुक मिजाज थे ..और बहुत कड़क भी ...अगर हमको
थोडा सा प्याज़ ज़्यादा चाहिए होता तो , तो हम उनसे
ये कहने मॆं हिचकते थे कि अब बाबा घूरेंगे और
हमारी जान बग़ैर एक लफ्ज़ कहे ही निकाल
डालेंगे ...... और डरते या हिचकते भी इसलिए थे
कि वो बहुत बडे थे और उस ज़माने मॆं अपने से बडे
लोगों को जवाब देना या उनसे तुक-ब-तुक करना समझ
लीजिये आफत मॆं जान डाल देगा ....और शामत तो
आनी ही आनी होगी इस हरकत पर ...
इसलिए चुपचाप रहकर और इस बात पर अमल करके ...कि
जी खामोशी हजार नेमत है ....उँगलियों से होंट
साफ करते हुए घर मॆं दाखिल हो जाते थे कुछ
ऐसे जैसे के बच्चा शर्माता है ...और ये कहने से
कतरता है ...कि वो हमको चुपचाप देख रहा है ...और
हम उसको देखकर नज़रअंदाज़ करते हैं .....
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो महसूस ये होता
है ,कि रास्ते के तमाम चराग़ पीछे छूट
गए ...अब उनकी हल्की हल्की , मद्धम सी रोशनी
रास्ते को थोडा रोशन करती दिखाई देती है...और
वो १० पैसे का चमचमाता सिक्का ... वो सुकून , वो
छोलों का दौना ...और वो दरख्त की ठंडी
छाँव सब ख़त्म हुई...वो गुडियों भरे ताक़ ,वो
मेहराब सबके सब अब सूने पड़े है...जिनमें कभी
गुड्डे-गुडियों की शादी रचाया करते थे और उन
ताकों को कुछ ऐसे सजाते थे जैसेकि बस गुडिया
का ताक गन्दा न नज़र आये ...और यहीं से सलीके
की सीधी चढती नज़र आती थी ... काश !!!!!!
ये इतना सब कुछ पीछे न छूटता तो शायद हम भी
वहीं होते जहाँ हमको होना था ...खैर अब सिर्फ
यही है ...के चराग़ों की रोशनी की तरह कहीं
हम भी जलें...
अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ
मैं जल रह हूँ , हवा से कहो बुझाये मुझे
लेकिन वो मज़ा बचपन का आज भी हिलोरें मारता
है ...वो खुशियों का समंदर आज भी सर उभारता
है ...मगर वो सुकून कहाँ अब !!सब शहर की नज़र
हो गया ....और शहर के एक्सपोज़र ने सब ले
लिया ,,,बदले मॆं कया दिया ......चंद
सिक्के .......लेकिन उन सिक्कों की जगह , कहीं बैंक्स
ने ले ली ,,ज़रा जियादा एक्स्पोज़र मिला तो क्रेडिट कार्ड की
नज़र ज़िंदगी होती दिखाई दी ,,,और आज प्लास्टिक
की तहों मॆं अनफोल्डेड ज़िंदगी ....किस्तों मॆं
बंटी दिखाई देती है
ख़त्म करना चाहूँगी एक शेर के साथ ....
अब कहाँ वो झोंके हवा जैसे
आग है जंगल की हवा जैसे .....
फरज़ाना
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किस तरह भूलेगा दिल उनका ख़याल आया हुआ... नूरजहाँ
Monday, January 21, 2008
दस पैसे के सिक्के और बचपन की यादें
छापक इरफान at 10:44 AM
फ़्लैग्स औरों के बहाने, पॉडकास्ट
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2 टिप्पणियां:
इरफान भाई, ऊं...हूं ...ऊं..हूं....ऊं..हूं...यह तो मेरे वाला सिक्का है, मेरी निक्कर की फटी पाकेट से गिरा था, चुपचाप वापिस कर दो, इरफान भाई....ऊं...हूं.....ऊँ...हूं....ऊं ...हूं..यह मेरे पापा जी ने मुझे स्कूल के लिए दिया था.......
PS....Irfan bhai, please do tell Farzana bibi that it was an excellent piece,इसीलिए इस को वापिस लेने के लिए आप से थोड़ा लडना पडा। हां, याद आया कि मेरा तो एक ऐसा ही सिक्का मेरी स्लेट के साथ यहां पड़ा हुया है, चाहें तो आप भी देख लें
chopraparveendr.blogspot.com
हमने तो दो पैसे और तीन पैसे में भी अपने बचपन में खूब खिलौने खरीदे हैं। आपके दस पैसों ने तो हमें अपना बचपन याद दिला दिया।
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