
जब बहुत शोर हो और कुछ रस्मी-बेमानी शुभकामनाओं और शुभेच्छाओं से मन उकता जाये तो आइये कहें.
फिल्म: स्वामी विवेकानंद (1998), संगीत: सलिल चौधरी, गीत: गुलज़ार
Monday, December 31, 2007
साल की पहली पेशकश
छापक इरफान at 11:21 PM 17 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
फहमीदा रियाज़ की दो नज़्में और, साल को अलविदा
छापक इरफान at 12:11 AM 4 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
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Saturday, December 29, 2007
एक ही जैसे दु:खद प्रसंग हैं...

...आइये सुनें मशहूर पाकिस्तानी शायरा फ़हमीदा रेयाज़ की एक और नज़्म.
नोट: साल के इन बचे हुए दिनों में टूटी हुई बिखरी हुई पर बस यही होगा.
वो लड़की
छापक इरफान at 10:57 PM 4 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
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Friday, December 28, 2007
बेनज़ीर की हत्या और नरेंद्र मोदी की जीत एक जैसे ही दुःखद प्रसंग हैं!
गुज़रता साल भारतीय उपमहाद्वीप के लिये दो गहरे आघात दे गया. आइये दुख की इस घड़ी में सुनें मशहूर पाकिस्तानी शायरा फ़हमीदा रेयाज़ की कुछ और नज़्में और कट्टरवादी ताक़तों से लोहा लेने की ताक़त जुटाएं.
नोट: साल के इन बचे हुए दिनों में टूटी हुई बिखरी हुई पर बस यही होगा.
मेरी चमेली की नर्म ख़ुशबू
पत्थर की ज़ुबाँ
सर्दियों की एक शाम
छापक इरफान at 10:22 PM 2 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
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Thursday, December 27, 2007
नरेंद्र मोदी की जीत और बेनज़ीर भुट्टो की हत्या एक ही जैसा दु:खद प्रसंग है!
गुज़रता साल भारतीय उपमहाद्वीप के लिये दो गहरे आघात दे गया. आइये दुख की इस घड़ी में सुनें मशहूर पाकिस्तानी शायरा फ़हमीदा रेयाज़ की नज़्में और कट्टरवादी ताक़तों से लोहा लेने की ताक़त जुटाएं.
नोट: साल के इन बचे हुए दिनों में टूटी हुई बिखरी हुई पर बस यही होगा.
बीत चली उदास शाम
अब सो जाओ
एक रात की कहानी
कभी-कभी
छापक इरफान at 10:32 PM 12 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
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भाई गोकुल को उनके पसंदीदा गायक उस्ताद हुसैन बख़्श की गाई एक दिलचस्प ग़ज़ल सप्रेम

गोकुल की बेचैनी मुझसे उस दिन देखी न गयी. एक ग़ज़ल सिंगर के लिये इतनी बेचैनी! कमाल है. मैने तय किया कि किसी भी तरह हो, उनके उस कैसेट को रिट्रीव किया जाय जिससे अब वो निराश हो चुके हैं. तो भाइयो, मैंने कल देर रात तक इसमें हज़ार हिकमतें लगा कर ऐसा तो बना ही दिया कि अब आप भी इसे सुन सकते हैं. अशोक पांडे मानेंगे कि किसी क़द्र ये ग़ज़ल उन ग़ज़लों में से है जिन्हे गाने में थोडी मास्टरी चाहिये. हुसैन बख़्श, कहा जाता है कि उस्ताद फैयाज़ ख़ाँ साहब के शागिर्द हैं और ग़ुलाम अली उनके शागिर्द हैं. काफ़ी और ग़ज़ल के अलावा वो ख़याल के भी मास्टर बताए जाते हैं. मैंने उस दिन देखा कि राधिका को भी हुसैन बख़्श बहुत पसंद हैं.
तो दोनों भाई बहन को और आप भाई-बहनों को यह ग़ज़ल पहुँचती है, साथ ही यूट्यूब पर मिली उनकी गाई आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक भी.
मैं आम तौर पर यूट्यूब के वीडियो यहाँ लगाने से बचता हूँ क्योंकि यह मेरे ऐस्थेटिक्स को सूट नहीं करती, मतलब मेरे टेम्पलेट में वे एक भद्दा रंग भरते हैं. बहरहाल मैं आज यह वीडियो गोकुल और राधिका के लिये जारी करता हूँ.
उन बहारों पे गुलिस्ताँ पे हँसी आई...
छापक इरफान at 10:28 AM 0 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
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Tuesday, December 25, 2007
एक लिस्नर से मुलाक़ात
एफ़एम लिस्नर्स के अनेक रूप हैं. इस बारे में एक पोस्ट यहाँ पहले से है और यहाँ भी एक लिस्नर का ज़िक्र है.
मेरे सहकर्मी , श्रोताओं के पत्रों के प्रति आम तौर पर एक ही रवैया रखते हैं कि उनको शामिल करके कार्यक्रम में पत्र या ईमेल शामिल करने की रस्म निभा दी जाये. फ़ोन-इन प्रोग्राम में भी श्रोता को महज़ एक संख्या मानना इसी का एक हिस्सा है.
अच्छे श्रोता मुझे समय-समय पर मिलते रहे हैं और मुझे हर बार उनसे कुछ नया सीखने और जानने को मिलता है.
ब


