आज एक आदमी दिखाई दिया. उसका दाहिना हाथ नहीं था. वह अपनी कार में बैठा और ड्राइव करता हुआ चला गया. मैंने सुधीर से कहा "देखो! ये आदमी एक हाथ से कार चला रहा है!"
मुनीष बोला- "उसे ड्राइविंग लायसेंस कैसे मिला?"
दृश्य एक, सरोकार अलग अलग.
फ़राह मेरी छोटी बेटी का नाम है. सेकंड स्टैंडर्ड में है. जब वो प्ले ग्रुप में थी उसने एमएफ़ हुसेन से एक पार्टी में पूछा "आप नंगे पैर रहते हो आपके पैर कोई कुचलता नहीं है?"
आप तो जानते हैं कि हुसेन नंगे पैरों के लिये अलग से पहचाने जाते हैं.
आप यह भी जानते हैं कि स्कूल बसों की भीड में बच्चों के पैर एक दूसरे को कुचलते रहते हैं और वो अपने जूतों की वजह से तकलीफ़ कम मह्सूस करते हैं.
मैंने हुसेन के नंगे पैरों पर कई तरह की बातें और जिज्ञासाएं सुनी हैं लेकिन फ़राह की चिंता उन सब से अलग है.
बहरहाल छिब्बरजी ने बताया कि जब वो ड्राइविंग लायसेंस के लिये गये तो अफ़सर ने उनसे कहा- अपने दोनों हाथ ऊपर करो!
पता चला कुछ ऐसे लोगों को को भी ड्राइविंग लायसेंस इश्यू किये गये हैं जिनके दोनों हाथ नहीं हैं.
Friday, June 29, 2007
छापक इरफान at 11:03 PM 3 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
Monday, June 25, 2007
दिल ने फिर याद किया !
साइलेंट इरा से साउंड इरा में क़दम रखते ही फ़िल्मों में गाने बजाने की एक ज़बर्दस्त दुनिया अंगडाई लेने लगी.
आज हम आसानी से कुछ पुराने गायकों, संगीतकारों और गीतकारों के नाम लेकर समझते हैं कि हमने अपनी फ़िल्म संगीत की विरासत से अपना वास्ता जोड लिया. केएल सहगल, कानन बाला, तिमिर बरन, केसी डे, पंकज मलिक, देविका रानी, नूरजहां, शमशाद बेगम, सुरैया और गीता दत्त होते हुए शायद आप उमा देवी तक का नाम ले लें. रफी, मुकेश, किशोर, मन्ना डे और लता, आशा, तलत तो नए में ही गिने जाते हैं.
गायिका सुशीला 1938 
अब मैं नेमड्रॉपिंग का खतरा उठाऊंगा क्योंकि ये कुछ ऐसे नाम हैं जिनके बग़ैर फिल्म म्यूज़िक का ज़िक्र अधूरा रहता है. इन्हीं लोगों की यादों को समर्पित है एफएम गोल्ड के रेडियो मैटिनी तीन से छः का यह 'दिल ने फिर याद किया' सेक्शन. संडे की शाम 5 से 6 बजे तक आप सुन सकते हैं हिंदी फिल्मों के प्रारंभिक दौर का दुर्लभ संगीत और अब काल के गाल में लुप्त हो चुके महारथियों का ज़िक्र.
कुछ बिसरे गायक-
1. सुरेश
2. गोविंदराव टेम्बे
3. बिब्बो
4. सुरेंद्र
5. अरुण कुमार
6. विष्णु पगणीस
7. सरदार अख़्तर
8. इला घोष
9. रामदुलारी
10.ख़ान मस्ताना
11.श्याम
12.एस डी बातिश
13.जीएम दुर्रानी
14.चितलकर
15.कल्याणी
16.पारुल घोष
17.धनंजय भट्टाचार्या
18.अणिमा दासगुप्ता
19.सुलोचना कदम
20.अमृत लाल
21.माया बनर्जी
22.ज़ीनत बेगम
23................सूची जारी है!
गुनगुना सकें तो गुनगुनाइये...
फिल्म्-सफर का ये गीत्त "कभी याद करके गली पार करके चली आना हमारे अंगना......"
आवाज़ें हैं बीणापाणि मुखर्जी और चितलकर की.
गीत लिखा है अपने गोपाल सिंह नेपाली ने और धुन ज़ाहिर है चितलकर ने ही बनाई है यानी सी.रामचंद्र ने.
काश कि पॉडभारती वाले देबाशीष मुझे ये बता देते कि इस गीत को उसी तरह कैसे यहां चढाऊं जैसे वो अपने पॉड्भारती के साउंड चढाते हैं. मुझे कोई और प्लेयर पसंद नहीं.
छापक इरफान at 11:08 PM 1 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
फ़्लैग्स रेडियोएक्टिव
Sunday, June 24, 2007
रेडियो मैटनी 3 से 6

दिल्ली में अब दस से ज़्यादा एफएम चैनल्स हैं जो 24x7 प्रसारण करते हैं.मैं इनमें से एक पर रेडियो जॉकी हूं. इसका नाम है एफएम-गोल्ड. इसे आप 106.4 मैगाहर्ट्ज़ पर दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में सुन सकते है. जालंधर में ये आपको एफ़एम 107.2 मैगाहर्ट्ज़ पर सुनाई देता है जबकि हिन्दुस्तान के किसी भी कोने में आप इसे शॉर्टवेव 31 मीटर बैंड पर सुन पाते हैं. ये शॉर्टवेव पर कैसे पहुंचता है इसकी ख़बर प्रसारकों को भी नहीं है. श्रोताओं की चांदी है और टेक्निकल लोग इसका ये लीकेज रोक भी नहीं पा रहे हैं. कहा जाता है कि प्रायवेट चैनेल्स की तकनीकी प्रसारण गुणवत्ता के सामने यह कहीं नहीं ठहरता और यह भी उडती हुई ख़बरें सुनी जाती हैं कि इस चैनेल को सैबोटाज करने के लिये प्रशासनिक मशीनरी प्रायवेट ऑपरेटरों के साथ गहरी सांठगांठ में मुब्तिला है. सुदूर चीन और भारतीय उपमहाद्वीप से मिलनेवाली ईमेल्स और चिट्ठियां बताती हैं कि इस चैनेल की साख़ अच्छी है और वजह ये बताई जाती है कि इसकी पहचान अलग है क्योंकि बाक़ी सारे चैनेल एक जैसा ही संगीत बजाते हैं, एक को दूसरे से अलग कर पाना और पहचानना मुश्किल है. मुनाफ़े-टीआरपी के चक्कर में बेसिरपैर की प्रोग्रामिंग करते हैं. इसके उळट समाचारों और जानकारियों के साथ एक खास दौर का संगीत ही इस चैनेल पर सुनाई देता है. लोग नॉनस्टॉप-नॉनसेंस चैटिंग को एक सीमा तक ही झेलते हैं और वापस पुराने गानों और जानकारियों की दुनिया में लौट आते हैं.
इस परिचयात्मक नोट के लंबा खिंच जाने से मैं अभी तक अपनी बात शुरू नहीं कर पाया हूं जिस बात के लिये मैंने ये पोस्ट लिखने का मन बनाया इसलिए सीधे मुद्दे की बात पर आता हूं.
शनिवार और इतवार दोपहर तीन बजे से छः बजे तक का वक़्त एफएम पर जिस प्रोग्राम के लिये मुक़र्रर है उसका नाम है- 'रेडियो मैटिनी तीन से छः', इस प्रोग्राम में किसी फ़िल्म को लेकर उसके बारे में बात होती है और उस फ़िल्म का साउंडट्रैक बजाते हुए गाने और फ़िल्म की कहानी सुनाई जाती है. भारी संख्या में श्रोता इसमें फोन करके हिस्सा भी लेते हैं. इस प्रोग्राम का आखिरी घंटा पुराने और दुर्लभ गीतों को समर्पित है जिसका ज़िक्र जल्द ही करूंगा. तो रेडियो मटिनी में आम-तौर पर यह विवेच्य फिल्म पुरानी ही होती है. अब तक मैं इसमें प्रमुख रूप से 'अलबेला', 'आग', 'सूरज और चंदा', 'तीसरी क़सम', 'मंडी', 'दिले नादां', 'भूमिका' और 'कथा' फिल्में ले चुका हूं. आज मैने जो फ़िल्म उठाई थी वो थी 'सोने की चिडिया'.
"सोने की चिडिया" में मुझे कभी 'भूमिका' और कभी 'मेघे ढका तारा' की याद आती रही. हालांकि ये दोनों ही फ़िल्में 'सोने की चिडिया' के बाद बनीं हैं.
इसे लिखा और प्रोड्यूस किया है इस्मत चुग़ताई ने, निर्देशक शाहिद लतीफ़ हैं, संगीत ओपी नैयर का है, गीत साहिर लुधियानवी , मजरूह सुल्तानपुरी और कैफी आज़मी ने लिखे हैं. फ़िल्म 1958 में बनी थी. बॉक्स ऑफ़िस पर तब इसकी क्या रिपोर्ट रही,आप बताएंगे तभी हम जान पायेंगे. फ़िल्म में नूतन, तलत महमूद और बलराज साहनी प्रमुख कलाकार हैं. धूमल इसमें बन रही फ़िल्म के टिपिकल प्रोड्यूसर बने हैं जिन्हें बलराज साहनी एक प्रसंग में बेवक़ूफ़ बताते हैं.
गाने जिस क्रम में आते हैं वो इस प्रकार है---
1. बेकस की तबाही के सामान हज़ारों हैं/ आशा भोंसले
2. प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी/ तलत-आशा
3. छुक-4 रेल चले चुन्नू-मुन्नू आयें तो ये खेल चले/ आशा
4. सच बता तू मुझपे फ़िदा/ तलत-आशा
5. रात भर का है मेहमां अंधेरा किसके रोके रुका है सवेरा/ रफी
6. सइयां जब से लडी तोसे अंखियां/ आशा
इन गीतों के अलावा इसमें कैफ़ी आज़मी की मशहूर नज़्म भी है जिसका पार्श्व पाठ बलराज साहनी के लिये खुद कैफ़ी आज़मी ने किया है -
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुट्पाथ पे नींद आयेगी
सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड्की इसी दीवार में खुल जायेगी.....
फिल्म में ये नज़्म पूरी रखी गई है, मैं इसके इतने अंश को जारी करते हुए उम्मीद करता हूं कि आगे तो आपको याद ही होगी. फिल्म में एक फिल्म का फ़ायनांसर-प्रोड्यूसर है जिसके सामने एक इंक़लाबी शायर श्रीकांत(बलराज साहनी) फिल्म के डायरेक़्टर की बात रखने के लिये ये नज़्म सुना रहा है. प्रोड्यूसर अपने बाल नोच रहा है और "कोई खिड्की इसी दीवार में खुल जायेगी" सुनने पर अपने कमरे की खिड्की को बडी चिंता के साथ देखता है.
'सोने की चिडिया' लछ्मी या लच्छो (नूतन) के जीवन की दुख भरी दास्तान है. लछ्मी एक युवती है जिसके मां-बाप मर चुके हैं और कोई भी उसे अपनाना नहीं चाहता. दूर की रिश्ते के मामा मामी उसे दूर के रिश्ते की काका-काकी के मत्थे मढ्कर चलते बनते हैं. काका कीमियागर है और सोना बनाने के प्रयोग में दिन-रात जुटा रहता है, आदमी वो दिल का अच्छा है. घर में कलह एक स्थाई भाव है. घर का बडा बेटा अपनी पत्नी के साथ घर छोड कर ससुराल जा बसता है. छोटा शराब और बदकारियों से घिरा क़र्ज़ में डूबता जाता है. जब क़र्ज़ चुकाने में वह अपने को बेबस पाता है तो एक रात लछ्मी को किसी बहाने से घर के बाहर भेजता है. दरअस्ल ये उसकी एक चाल होती है ताकि इस सौदे के एवज़ वह अपने क़र्ज़ से मुक्त हो जाये. जिन ग़ुंडों की सेवा में लछमी भेजी जाती है उनसे बचती-बचाती आखिरकार वो एक थियेटर में शरण पाती है जहां संयोग़ से उसे गीत गाता पडता है.
गाने और अभिनय से उसका चर्चा चारों तरफ चल निकलता है और जल्द ही वो फ़िल्मों में एक कामयाब हीरोइन बन जाती है. घर में अब लछ्मी कमाऊ 'सोने की चिडिया' साबित होती है. उसका निजी जीवन दासों जैसा ही है क्योंकि सारा हिसाब किताब उसका 'भाई' ही रखता है. 
थॉडे समय के लिये उस्के जीवन में अमर(तलत महमूद) आता ज़रूर है लेकिन वह भी एक लोभी और मतलबपरस्त किरदार साबित होता है. प्यार में ठुकराई गयी लछ्मी एक मेंटल ट्रॉमा से गुज़रती है. हारकर वह आत्महत्या का फैसला करती है लेकिन "रात भर का है मेहमां अंधेरा किसके रोके रुका है सवेरा" सुनकर प्रेरित होती है और जीवन में वापस आ जाती है क्योंकि ये गीत और कोई नही, लछ्मी का पसंदीदा इंक़लाबी शायर श्रीकांत गा रहा होता है. 
लछ्मी पहले अमर के साथ भी शादी करने के बाद बहुत सारे बच्चे पाने की तमन्ना रखती थी और वही इच्छा श्रीकांत के साम्ने भी ज़ाहिर करती है. श्रीकांत स्वाभिमानी और मूल्यों में विश्वास रख्नने वाला आदमी है और वह लछ्मी के कलाकार से सहमत नहीं है. तभी एक दिन उसे फ़िल्मों में काम करने वाले एक्स्ट्राओं के जीवन का भयावह अंधेरा दिखाई देता है. वह इन एक्स्ट्राओं के जीवन में थोडी खुशहाली लाने के लिये एक ऎसा समझौता करता है जिसे समझना मुश्किल है. क्या था वो समझौता? जानने के लिये देखिये सोने की चिडिया.
इस्मत चुग़ताई ने कहानी का ऐसा मार्मिक ताना बाना बुना है कि वह किसी फार्मूले की याद नहीं दिलाता. शाहिद लतीफ ने कुछ चालू डिवाइसेज़ का ऐसा इस्तेमाल किया है जिससे उनमें नयी ताक़त भर गयी है. फिल्म एक्स्ट्राओंवाले सीक्वेंस में तो आप भूल ही जाते हैं कि यह फीचर फिल्म है, यहां ये एक डॉक्युमेंट्री का काम करने लगती है. बलराज साहनी हमेशा की तरह एक अच्छे एक्टर नहीं बल्कि ज़िम्मेदार आदमी दिखाई दिये हैं.
छापक इरफान at 11:31 PM 9 टिप्पणियां इस पोस्ट का जुड़ाव
फ़्लैग्स रेडियोएक्टिव
Monday, June 18, 2007
फूल का कहना सुनो

चार साल पहले मैंने कहानियों की एक किताब ले तो ली पर उसकी समीक्षा लिखके आज तक न दे सका. ऎसा मेरी काहिली से हुआ,ये मैं नहीं मानता. शायद इस काम से मिलनेवाले पैसों की बनिस्बत ज़्यादा पैसोंवाले काम को मैने तरजीह दी.इसका कोई मलाल भी नहीं है कि मैने समीक्षा क्यों नहीं लिखी; और सच तो यह है कि पृथ्वी को चन्द्रमा की कहानियां मेरे सौन्दर्यबोध का हिस्सा नहीं थीं इसलिये एक पाठ्यक्रमीय दबाव के तहत पढ तो गया लेकिन एक कॉंस्टेंट रेज़िस्टेंस बना हुआ था. बहरहाल अब उस वाक़ये को याद करने का अभी क्या तुक है.
इस संग्रह में एक बच्ची के ऑब्ज़र्वेशंस फूल का कहना सुनो नाम से दर्ज हैं और नौ उपशीर्षकों में उन्हें बांटा गया है. मैने अब तक इस किताब को ज़रूर ही किसी पढाकू पाठक के हवाले कर दिया होता. इसी फूल का कहना सुनो के लिये ये मेरे सरमाए का अब भी हिस्सा है. मैं चाहता हूं कि इसका एक टुकडा आप भी पढें. तो लीजिये पेश है-
बाज़ार में गुम तो गुम
घर से थोडी दूर पर किराना दुकान है. पर हमारे घर का सामान वहां से नहीं आता. हमारे घर का बहुत सा सामान वहां नहीं मिलता. वह दुकान कच्चे घरों के लिये है. मेन रोड तक बाहर निकलो तो और दुकानें हैं...उनसे और आगे बढो तो और दुकानें हैं. आगे बढते-बढते गोल बाज़ार पहुंच जाओ तो इतनी दुकानें हैं...इतनी दुकानें हैं कि उनके बीच घूमते-घूमते थक जाओ.
गोल बाज़ार से बाएं जाओ तो नवीन बाज़ार है. गोल बाज़ार से दाएं जाओ तो शास्त्री बाज़ार है. बाज़ार में ज़मीन की ओर उतरो तो भी दुकानें हैं...आकाश की ऊपर उठो तो भी दुकानें हैं...ओह! कितनी दुकानें! मुझे बाज़ार घूमना अच्छा लगता है.
शास्त्री बाज़ार में एक 'सुपर मार्केट' है- हम वहां से सामान ख़रीदते हैं. वहान सब मिलता है. वहां जाना मुझे अच्छा लगता है. वहान जाना मां को भी अच्छा लगता है. हम एक ट्रॉली ले लेते हैं और उसे धकेलते सामान के बीच गुज़रते हैं. मेरे दोनों तरफ़- मí

